Garud Puran: हिंदू धर्म में जीवन से जुड़े 16 संस्कारों का विशेष महत्व बताया गया है। इनमें अंतिम संस्कार यानी अंत्येष्टि संस्कार को जीवन की अंतिम धार्मिक प्रक्रिया माना जाता है। परंपरागत रूप से पिता की मृत्यु के बाद बड़े बेटे को मुखाग्नि देने की जिम्मेदारी दी जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों किया जाता है? क्या इसके पीछे सिर्फ पारिवारिक परंपरा है या धार्मिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं? आइए, समझते हैं मुखाग्नि और अंतिम संस्कार से जुड़े इन सवालों को।
पिता को बड़ा बेटा ही मुखाग्नि क्यों देता है?
हिंदू धार्मिक परंपराओं में पुत्र को माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करने वाला माना गया है। कई मान्यताओं के अनुसार, पुत्र अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार, श्राद्ध और अन्य धार्मिक कर्मों को पूरा करके उनके प्रति अपना ऋण चुकाता है।
इसी धार्मिक सोच के कारण परंपरागत रूप से पिता की मृत्यु के बाद बड़े पुत्र को मुखाग्नि देने की जिम्मेदारी दी जाती रही है। परिवार में सबसे बड़े बेटे को यह जिम्मेदारी सौंपने के पीछे यह विचार भी जुड़ा है कि वह परिवार के महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्यों को आगे बढ़ाए।
हालांकि, बड़े बेटे द्वारा ही मुखाग्नि देना हर हिंदू परिवार या समुदाय में अनिवार्य नियम नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में अंतिम संस्कार की विधि अलग हो सकती है। कई जगह छोटे बेटे या परिवार के किसी अन्य करीबी सदस्य द्वारा भी अंतिम संस्कार किया जाता है।
पुत्र से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं
प्रचलित धार्मिक व्याख्याओं में ‘पुत्र’ शब्द को ऐसे व्यक्ति से जोड़ा जाता है, जो अपने माता-पिता को कठिन अवस्था से उबारने में सहायक बने। इसी सोच के आधार पर माता-पिता के अंतिम संस्कार और श्राद्ध जैसे कर्मों को पुत्र के महत्वपूर्ण कर्तव्यों में गिना गया है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल पुत्र द्वारा किए गए संस्कार से ही मृत व्यक्ति को मुक्ति मिलती है। इस विषय पर अलग-अलग शास्त्रीय परंपराओं और समुदायों में विभिन्न मान्यताएं मिलती हैं।
हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार को क्यों माना जाता है महत्वपूर्ण?
हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार को अंत्येष्टि संस्कार कहा जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, मृत्यु के बाद शरीर को पंचतत्वों में विलीन करने के लिए दाह संस्कार किया जाता है।
हिंदू दर्शन में मनुष्य के शरीर को स्थूल और सूक्ष्म स्तरों पर समझाया गया है। स्थूल शरीर वह है, जिसे हम देख और स्पर्श कर सकते हैं। वहीं, सूक्ष्म शरीर को मन, बुद्धि, प्राण और इंद्रियों से संबंधित माना जाता है।
कुछ धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में सूक्ष्म शरीर को 17 तत्वों से जुड़ा बताया गया है। इनमें पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां, पांच प्राण, मन और बुद्धि शामिल हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, मृत्यु के बाद जीवात्मा स्थूल शरीर से अलग होकर अपनी आगे की यात्रा करती है। अंतिम संस्कार को इसी धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जाता है।
शरीर को अग्नि देने की परंपरा का क्या अर्थ है?
हिंदू धर्म में अग्नि को पवित्रता और परिवर्तन का माध्यम माना गया है। दाह संस्कार के दौरान अग्नि के माध्यम से शरीर को पंचतत्वों में विलीन करने की धार्मिक कल्पना की जाती है।
मान्यता है कि दाह संस्कार के बाद मृत व्यक्ति का स्थूल शरीर प्रकृति के तत्वों में वापस मिल जाता है। इसके बाद अस्थि-संग्रह, विसर्जन, श्राद्ध और अन्य कर्म किए जाते हैं।
इन धार्मिक क्रियाओं का उद्देश्य मृत व्यक्ति के प्रति अंतिम कर्तव्य निभाना और उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करना माना जाता है।
पंचतत्वों में विलीन होने की मान्यता
हिंदू धार्मिक विचारधारा में शरीर को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना माना जाता है। दाह संस्कार को शरीर के इन तत्वों में वापस लौटने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है।
यह धार्मिक और आध्यात्मिक व्याख्या है। अलग-अलग संप्रदायों और क्षेत्रों में अंतिम संस्कार से जुड़ी मान्यताओं और विधियों में अंतर हो सकता है।
मटकी फोड़ने की परंपरा क्यों निभाई जाती है?
कई हिंदू परंपराओं में मुखाग्नि देने से पहले या दाह संस्कार के दौरान शव की परिक्रमा करने की विधि बताई जाती है। इसके बाद जल से भरे मिट्टी के कलश को जमीन पर फोड़ा जाता है।
इस परंपरा को शरीर और सांसारिक संबंधों की नश्वरता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। कलश का टूटना इस बात का संकेत माना जाता है कि शरीर से जुड़ा सांसारिक संबंध समाप्त हो रहा है और जीव की आगे की यात्रा शुरू हो रही है।
हालांकि, मटकी फोड़ने की विधि सभी समुदायों में एक जैसी नहीं होती। इसकी प्रक्रिया और समय क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार बदल सकता है।
चिता में चंदन, घी और कपूर क्यों रखा जाता है?
हिंदू अंतिम संस्कार की कई परंपराओं में चंदन, घी, कपूर और अन्य सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इन सामग्रियों को धार्मिक रूप से पवित्र माना जाता है और अग्नि संस्कार में इनका उपयोग परंपरागत विधि का हिस्सा रहा है।
चंदन को सुगंध और पवित्रता से जोड़ा जाता है, जबकि घी और कपूर का इस्तेमाल विभिन्न धार्मिक विधियों में किया जाता है। हालांकि, इन सामग्रियों के उपयोग का तरीका अलग-अलग परिवारों और समुदायों में अलग हो सकता है।
इन सामग्रियों के इस्तेमाल को केवल प्रदूषण रोकने का उपाय बताना सही नहीं होगा। अंतिम संस्कार में इनका उपयोग मुख्य रूप से धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं से जुड़ा रहा है।
क्या केवल बड़ा बेटा ही मुखाग्नि दे सकता है?
बड़े बेटे द्वारा मुखाग्नि देने की परंपरा प्रचलित जरूर है, लेकिन इसे हर हिंदू परिवार के लिए समान और अनिवार्य नियम नहीं माना जा सकता।
अगर बड़ा बेटा मौजूद न हो या किसी कारण से अंतिम संस्कार न कर सके, तो कई परंपराओं में छोटा बेटा या परिवार का कोई अन्य करीबी सदस्य मुखाग्नि दे सकता है।
कुछ परिवारों और समुदायों में बेटियों द्वारा भी माता-पिता का अंतिम संस्कार करने की परंपरा अपनाई गई है। इसलिए मुखाग्नि को केवल बेटे के अधिकार के रूप में देखने के बजाय इसे मृत व्यक्ति के प्रति अंतिम कर्तव्य, श्रद्धा और पारिवारिक जिम्मेदारी के रूप में समझना अधिक उचित है।
अंतिम संस्कार में श्रद्धा और कर्तव्य का महत्व
धार्मिक परंपराओं में अंतिम संस्कार का उद्देश्य मृत व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करना और परिवार की ओर से अंतिम कर्तव्य निभाना माना जाता है।
इसलिए मुखाग्नि कौन देगा, इसका निर्णय कई बार परिवार की परिस्थितियों, स्थानीय परंपरा और धार्मिक रीति-रिवाजों के आधार पर किया जाता है। अलग-अलग मान्यताओं का सम्मान करते हुए अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।
निष्कर्ष: पिता को बड़े बेटे द्वारा मुखाग्नि देने की परंपरा धार्मिक मान्यताओं और पारिवारिक कर्तव्यों से जुड़ी है, लेकिन यह हर परिवार के लिए अनिवार्य नियम नहीं है। हिंदू धर्म की अलग-अलग परंपराओं में अंतिम संस्कार की विधि और जिम्मेदारी को लेकर विविधता देखने को मिलती है।
I have started working as a crime reporter in 2011 for a daily local newspaper named ‘Khusro Mail’. I have also worked for many news organization such as Public Vibe app and Oneindia Hindi news portal. Now I am working as Editor In Chief for Rocket Post Bharat (rocketpostbharat.com).