पीलीभीत:सरकारी गाड़ी, जंगल में जाम और जलती सिगरेट… आखिर किसके संरक्षण में खेला जा रहा था मौत का खेल?
पीलीभीत टाइगर रिजर्व में सरकारी सिस्टम की शर्मनाक तस्वीर
पीलीभीत। यह सिर्फ शराब पार्टी का मामला नहीं है। यह सत्ता के नशे, सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग, प्रशासनिक लापरवाही और जंगल की सुरक्षा से खिलवाड़ की ऐसी कहानी है, जिसने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है। जिस जंगल की रक्षा के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, जहां प्रवेश के लिए आम नागरिकों पर सख्त नियम लागू हैं, वहीं उसी जंगल में बेसिक शिक्षा विभाग की सरकारी गाड़ी रात के अंधेरे में बेखौफ घूमती रही। गाड़ी में सवार लोग कथित तौर पर शराब पी रहे थे, सिगरेट फूंक रहे थे और जलती सिगरेट जंगल में फेंक रहे थे। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि यह किसने किया, बल्कि यह है कि आखिर उन्हें यह हिम्मत मिली कहां से?
टाइगर रिजर्व नहीं, मानो किसी की निजी जागीर समझ लिया गया
25 जून की रात पीलीभीत टाइगर रिजर्व की माला रेंज में जो कुछ हुआ, वह जंगल के नियमों और कानून दोनों का खुला अपमान था। जिस क्षेत्र में आम आदमी का प्रवेश पूरी तरह नियंत्रित है, वहां बेसिक शिक्षा विभाग की गाड़ी में चार लोग देर रात पहुंचे। आरोप है कि गाड़ी में शराब पार्टी चल रही थी, हाथों में जलती सिगरेट थीं और उन्हें जंगल में ही फेंका जा रहा था।
यह कोई साधारण लापरवाही नहीं थी। मई और जून के महीने में जंगल सूखे पत्तों से ढका रहता है। ऐसी स्थिति में एक छोटी-सी चिंगारी भी हजारों हेक्टेयर जंगल को आग की लपटों में झोंक सकती है। यदि उस रात आग भड़क जाती, तो उसके लिए जिम्मेदार कौन होता? क्या कुछ लोगों की मौज-मस्ती के लिए बाघों और सैकड़ों वन्यजीवों की जिंदगी दांव पर लगा दी जाती?
सरकारी गाड़ी आखिर निजी मौज-मस्ती के लिए कैसे पहुंची जंगल?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल सरकारी वाहन के दुरुपयोग को लेकर है। आखिर बेसिक शिक्षा विभाग की गाड़ी सरकारी काम छोड़कर रात में जंगल के भीतर शराब पार्टी करने कैसे पहुंच गई?
क्या विभागीय अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं या सरकारी गाड़ियां निजी इस्तेमाल के लिए चालकों और अन्य लोगों के हवाले कर दी गई हैं? यदि अधिकारी ड्यूटी खत्म होने के बाद वाहन की निगरानी तक नहीं कर पा रहे, तो फिर सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और जवाबदेही का दावा किस आधार पर किया जा रहा है?
जिले में यह चर्चा कोई नई नहीं है कि कई विभागों में लगी निजी वाहन रात होते ही हूटर बजाते हुए सड़कों पर दौड़ते दिखाई देते हैं, जबकि उनमें संबंधित अधिकारी मौजूद तक नहीं होते। यदि यह सच है, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि सरकारी व्यवस्था का खुला मजाक है।
क्या प्रभावशाली लोगों के सामने प्रशासन बेबस है?
घटना के बाद वाहन स्वामी को नोटिस जारी किया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या इतनी गंभीर घटना में केवल नोटिस देकर औपचारिकता पूरी कर दी जाएगी?
स्थानीय चर्चाओं के अनुसार संबंधित वाहन स्वामी प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से जुड़ा बताया जा रहा है। यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के प्रभाव के कारण कार्रवाई कमजोर पड़ती है, तो यह कानून के समान अनुपालन पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा। कानून का असली अर्थ तभी है, जब वह आम और खास—दोनों पर समान रूप से लागू हो।
वन विभाग की तत्परता ने टाल दिया बड़ा हादसा
इस पूरे मामले में राहत की बात यह रही कि पीलीभीत टाइगर रिजर्व की गश्ती टीम ने समय रहते मामले का संज्ञान लिया। जांच में वाहन की पहचान हुई और आरोपों के आधार पर वन्यजीव संरक्षण से संबंधित प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज कर ली गई।
टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर मनीष सिंह ने स्पष्ट किया कि जंगल में धूम्रपान पूरी तरह प्रतिबंधित है और इस प्रकार की लापरवाही किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी। वन विभाग की त्वरित कार्रवाई ने कम से कम यह संदेश जरूर दिया कि जंगल की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाएगा।
यह सिर्फ कानून तोड़ने का मामला नहीं, प्रकृति के खिलाफ अपराध है
पीलीभीत टाइगर रिजर्व देश के महत्वपूर्ण बाघ संरक्षण क्षेत्रों में शामिल है। यहां बाघ, तेंदुआ, बारहसिंघा और अनेक दुर्लभ वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में शराब पार्टी करना और जलती सिगरेट फेंकना केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को खतरे में डालने जैसा कृत्य है।
एक लापरवाही हजारों पेड़ों, सैकड़ों वन्यजीवों और वर्षों की संरक्षण मेहनत को पलभर में खत्म कर सकती थी। इसलिए इस घटना को किसी सामान्य अनुशासनहीनता के रूप में नहीं देखा जा सकता।
जवाब सिर्फ चालकों से नहीं, अधिकारियों से भी मांगा जाना चाहिए
यदि सरकारी वाहन का दुरुपयोग हुआ है, तो जवाबदेही केवल चालक या उसमें बैठे लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि वाहन किसकी अनुमति से बाहर था, उसकी निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी और संबंधित विभाग के अधिकारियों ने अपने कर्तव्यों का पालन क्यों नहीं किया।
सरकारी वाहन सरकारी कार्य के लिए होते हैं, निजी ऐशो-आराम या कानून तोड़ने के लिए नहीं।
जंगल बचाना है तो रसूख नहीं, कानून चलेगा
पीलीभीत टाइगर रिजर्व की यह घटना प्रशासनिक जवाबदेही, सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग और पर्यावरण सुरक्षा—तीनों पर गंभीर सवाल छोड़ती है। यदि ऐसे मामलों में प्रभाव, पद या राजनीतिक संबंध कार्रवाई की दिशा तय करेंगे, तो जंगलों की सुरक्षा केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी।
जरूरत इस बात की है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में कोई भी सरकारी वाहन कानून और व्यवस्था को चुनौती देने का माध्यम न बने। क्योंकि जंगल किसी अधिकारी, विभाग या रसूखदार व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि देश की अमूल्य प्राकृतिक धरोहर हैं, जिनकी रक्षा करना हर नागरिक और हर सरकारी तंत्र की सर्वोच्च जिम्मेदारी है।