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Pilibhit के गोमती उद्गम स्थल की बदलेगी तस्वीर! 12.26 करोड़ की मंजूरी, तीनों झीलों का कायाकल्प और 1 MLD का STP बनेगा..

Pilibhit के गोमती उद्गम स्थल की बदलेगी तस्वीर! 12.26 करोड़ की मंजूरी, तीनों झीलों का कायाकल्प और 1 MLD का STP बनेगा..

Pilibhit के माधोटांडा स्थित गोमती उद्गम स्थल के लिए बड़ी खबर सामने आई है। केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद के प्रयासों से गोमती उद्गम स्थल के संरक्षण और कायाकल्प से जुड़ी 12.26 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी मिल गई है। इस योजना में तीनों झीलों का पुनर्जीवन, गंदे पानी को गोमती में जाने से रोकने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और जल प्रवाह को बेहतर बनाने जैसे काम शामिल हैं। खास बात यह है कि परियोजना को नमामि गंगे मिशन-III के तहत 100 प्रतिशत केंद्रीय क्षेत्रीय सहायता से लागू किया जाएगा।

झीलों के पुनर्जीवन से लेकर जल प्रवाह तक होंगे काम

स्वीकृत परियोजना के तहत गोमती उद्गम स्थल की तीनों झीलों का हाइड्रोलॉजिकल पुनर्जीवन किया जाएगा। इसका उद्देश्य जल प्रवाह और जल प्रबंधन को बेहतर बनाना है। मानसून के दौरान आने वाले पानी को नियंत्रित तरीके से आगे ले जाने के लिए एस्केप चैनल सिस्टम विकसित किया जाएगा।

इसके अलावा खराब हो चुके तटबंधों को मजबूत करने, जल निकासी और पानी के प्रवाह की व्यवस्था को व्यवस्थित करने का काम भी परियोजना में शामिल है।

3.23 किलोमीटर लंबे एस्केप चैनल की होगी डी-सिल्टिंग

परियोजना में करीब 3.23 किलोमीटर लंबे एस्केप चैनल की डी-सिल्टिंग, बंड रिपेयर और क्लियरिंग के कार्य प्रस्तावित हैं। इसके साथ ही फोरबे पूल और चैनल लाइनिंग का काम भी किया जाएगा।

इन कार्यों के जरिए गोमती उद्गम स्थल की जल संरचनाओं और पानी के प्रवाह को व्यवस्थित करने की योजना है।

गोमती में नहीं जाएगा बिना उपचारित गंदा पानी, बनेगा 1 MLD का STP

माधोटांडा के घरेलू सीवेज को रोकने की तैयारी

परियोजना का एक अहम हिस्सा माधोटांडा से निकलने वाले घरेलू सीवेज को बिना उपचार गोमती नदी में पहुंचने से रोकना है। इसके लिए इंटरसेप्टर ड्रेन और सीवर नेटवर्क तैयार किया जाएगा, जिसके जरिए सीवेज को मेन पंपिंग स्टेशन तक पहुंचाया जाएगा।

इस मेन पंपिंग स्टेशन की क्षमता 1.09 MLD रखी गई है। इसके बाद सीवेज को उपचार के लिए प्रस्तावित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में भेजा जाएगा।

Nature Based Solution से होगा सीवेज ट्रीटमेंट

परियोजना के तहत 1 MLD क्षमता का Nature Based Solution (NbS) आधारित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किया जाएगा। इसमें हॉरिजॉन्टल फ्लो कंस्ट्रक्टेड वेटलैंड की व्यवस्था होगी।

इस प्लांट के जरिए सीवेज का उपचार करने और उपचारित पानी को निर्धारित CPCB/NMCG मानकों के अनुरूप रखने का लक्ष्य है। यानी योजना का फोकस सिर्फ निर्माण पर नहीं, बल्कि नदी में प्रदूषण कम करने की व्यवस्था पर भी है।

12.26 करोड़ रुपये की परियोजना में किस काम पर कितना खर्च होगा?

सरकारी स्वीकृति के अनुसार परियोजना की कुल लागत 1225.82 लाख रुपये यानी करीब 12.26 करोड़ रुपये है। इसमें झील पुनर्जीवन, सीवेज ट्रीटमेंट और अन्य संबंधित कार्यों के लिए अलग-अलग बजट तय किया गया है।

परियोजना का बजट

झील पुनर्जीवन कार्य

463.45 लाख रुपये

₹4.63 करोड़

STP, पंपिंग स्टेशन और सीवेज व्यवस्था

735.57 लाख रुपये

₹7.36 करोड़

5 साल का संचालन और रखरखाव

26.80 लाख रुपये

₹26.80 लाख

कुल स्वीकृत लागत

₹12.26 करोड़

24 महीने में पूरा करना होगा निर्माण, 5 साल तक रखरखाव

DBOT मॉडल पर लागू होगी परियोजना

परियोजना के निर्माण कार्य को निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद 24 महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसे DBOT मॉडल पर लागू किया जाएगा।

निर्माण पूरा होने के बाद पांच वर्ष तक संचालन और रखरखाव की व्यवस्था भी परियोजना में शामिल है। पांच साल की अवधि पूरी होने के बाद प्लांट के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी।

चार महीने में जमीन और टेंडर प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश

केंद्र सरकार ने परियोजना को समयबद्ध तरीके से लागू करने के लिए कुछ स्पष्ट समयसीमाएं तय की हैं।

जमीन उपलब्ध कराने और कार्य आवंटन की समयसीमा

  • आवश्यक भूमि चार महीने के भीतर उपलब्ध करानी होगी।

  • स्वीकृति जारी होने के चार महीने के भीतर बिडिंग और कार्य आवंटन की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

  • यदि निर्धारित अवधि में परियोजना के लिए चिन्हित भूमि अधिग्रहित नहीं होती है, तो प्रशासनिक एवं व्यय स्वीकृति लैप्स हो सकती है।

इसका मतलब है कि परियोजना के निर्माण कार्य शुरू होने से पहले जमीन और टेंडर से जुड़ी प्रक्रियाओं को तय समय में पूरा करना जरूरी होगा।

सरकारी आदेश में साफ निर्देश, गोमती में नहीं जाएगा अनुपचारित सीवेज

परियोजना के लिए जारी शर्तों में स्पष्ट किया गया है कि माधोटांडा क्षेत्र में कोई भी अनुपचारित घरेलू या नगरपालिका अपशिष्ट जल गोमती नदी में नहीं गिरना चाहिए।

राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि परियोजना लागू होने के बाद कस्बे से कोई भी बिना उपचारित नाला गोमती में न पहुंचे। इस शर्त के जरिए नदी में गंदे पानी के सीधे प्रवाह को रोकने पर जोर दिया गया है।

जिला गंगा समिति और WAPCOS की होगी अहम भूमिका

किस संस्था को कौन सी जिम्मेदारी मिली?

परियोजना के क्रियान्वयन के लिए जिला गंगा समिति, पीलीभीत को Executing Agency बनाया गया है। वहीं WAPCOS Ltd. को Project Implementing Agency की जिम्मेदारी दी गई है।

राज्य स्तर पर State Mission for Clean Ganga, Uttar Pradesh परियोजना की योजना, प्रबंधन और प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी करेगा।

इस व्यवस्था के तहत अलग-अलग स्तरों पर परियोजना के निर्माण, प्रबंधन और निगरानी की जिम्मेदारियां तय की गई हैं।

रोजाना होगी पानी की जांच, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी रखेगा नजर

जल गुणवत्ता की निगरानी पर जोर

परियोजना में पानी की गुणवत्ता की नियमित निगरानी का भी प्रावधान है। Implementing Agency को पानी के नमूने लेकर दैनिक आधार पर नजदीकी मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में जांच करानी होगी।

इसके अलावा उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी समय-समय पर पानी की गुणवत्ता और संबंधित व्यवस्थाओं की निगरानी करेगा।

NMCG को भेजनी होगी प्रगति रिपोर्ट

परियोजना की भौतिक और वित्तीय प्रगति की नियमित रिपोर्ट राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन यानी NMCG को भेजना अनिवार्य किया गया है।

इससे परियोजना के निर्माण और खर्च से जुड़ी प्रगति की निगरानी की जा सकेगी।

गोमती उद्गम स्थल के लिए क्यों अहम है यह परियोजना?

माधोटांडा स्थित गोमती उद्गम स्थल पीलीभीत की महत्वपूर्ण प्राकृतिक और धार्मिक पहचान से जुड़ा हुआ है। प्रस्तावित परियोजना में एक साथ तीनों झीलों के पुनर्जीवन, जल प्रवाह के प्रबंधन, सीवेज के वैज्ञानिक उपचार और नदी में अनुपचारित गंदे पानी के प्रवाह को रोकने की व्यवस्था की जा रही है।

जितिन प्रसाद के प्रयासों से परियोजना की स्वीकृति को गोमती उद्गम स्थल के संरक्षण और पर्यावरणीय सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इसके वास्तविक परिणाम निर्माण पूरा होने और व्यवस्थाओं के प्रभावी संचालन के बाद ही स्पष्ट होंगे।

सरकारी स्वीकृति में परियोजना के तहत निर्मित परिसंपत्तियों के उचित उपयोग, रखरखाव और निगरानी की जिम्मेदारी भी संबंधित एजेंसियों पर तय की गई है।

अब आगे क्या होगा?

12.26 करोड़ रुपये की स्वीकृति के बाद परियोजना के लिए जमीन उपलब्ध कराने, बिडिंग और कार्य आवंटन की प्रक्रियाएं तय समयसीमा के भीतर पूरी करनी होंगी। इसके बाद निर्माण कार्य शुरू होने और 24 महीने के लक्ष्य के अनुसार पूरा करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

गोमती उद्गम स्थल पर झीलों के पुनर्जीवन और सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था लागू होने से जल प्रबंधन और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े लक्ष्यों को आगे बढ़ाने की कोशिश की जाएगी। परियोजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निर्माण, संचालन, रखरखाव और निगरानी की शर्तों को जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है।