पवित्र थी उनकी भक्ति
उनकी भक्ति पवित्र और अदम्य थी लेकिन वो माता पार्वती जी को हमेशा ही शिव से अलग समझते थे या फिर ऐसा भी कह सकते हैं कि वो माता को कुछ समझते ही नहीं थे। वैसे ये कोई उनका घमंड नहीं अपितु शिव और केवल शिव में आसक्ति थी जिसमें उन्हें शिव के आलावा कुछ और नजर ही नहीं आता था। एक बार तो ऐसा हुआ की वो कैलाश पर भगवान शिव की परिक्रमा करने गए लेकिन वो पार्वती की परिक्रमा नहीं करना चाहते थे।
माता पार्वती नेर किया था एतराज
ऋषि के इस कृत्य पर माता पार्वती ने ऐतराज प्रकट किया और कहा कि हम दो जिस्म एक जान है तुम ऐसा नहीं कर सकते। पर शिव भक्ति की कट्टरता देखिये भृंगी ऋषि ने पार्वती जी को अनसुना कर दिया और भगवान शिव की परिक्रमा लगाने बढ़े। किन्तु ऐसा देखकर माता पार्वती शिव से सट कर बैठ गईं। इस किस्से में और नया मोड़ तब आता है जब भृंगी ने सर्प का रूप धरा और दोनों के बीच से होते हुए शिव की परिक्रमा लेनी चाही।
फिर हुआ था महादेव के अर्धनारीश्वर का जन्म
तब भगवान शिव ने माता पार्वती का साथ दिया और संसार में महादेव के अर्धनारीश्वर रूप का जन्म हुआ। अब भृंगी ऋषि क्या करते किन्तु गुस्से में आकर उन्होंने चूहे का रूप धारण किया और शिव और पार्वती को बीच से कुतरने लगे। ऋषि के इस कृत्य पर आदिशक्ति को क्रोध आया और उन्होंने भृंगी ऋषि को श्राप दिया कि जो शरीर तुम्हे अपनी माँ से मिला है वो तत्काल प्रभाव से तुम्हारी देह छोड़ देगा।
श्राप के बाद हुआ था ऐसा
श्राप के त्वरित प्रभाव से भृंगी ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया। भृंगी निढाल होकर जमीन पर गिर पड़े और वो खड़े होने की भी क्षमता खो चुके थे l तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वती से अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी।
फिर माता ने वापस लिया श्राप
ऊं नमः शिवाय …हर हर महादेव
जय हो अर्धनारीश्वर महादेव की