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पीलीभीत में मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना के तहत 86 शिक्षकों को हेल्थ कार्ड वितरित। मिलेगा कैशलेस इलाज और बेहतर स्वास्थ्य सुरक्षा।

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पीलीभीत, पूरनपुर तराई क्षेत्र के लिए बड़ी खुशखबरी। 26 जुलाई से कासगंज–ऐशबाग एक्सप्रेस शुरू होगी, यात्रियों को बेहतर रेल कनेक्टिविटी सुविधा।

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वृद्धाश्रम की माताओं का जीवित्पुत्रिका व्रत: आँखों से छलके आँसू

वृद्धाश्रम की माताओं का जीवित्पुत्रिका व्रत: अब वही बेटे उन्हें चारदीवारी में छोड़कर चले गए हैं।

वृद्धाश्रम की माताओं का जीवित्पुत्रिका व्रत: कसया, कुशीनग समाज का असली रूप तब सामने आता है जब हम उन रिश्तों को देखते हैं जिन्हें सबसे ज्यादा सहेजा जाना चाहिए—मां और बेटे का रिश्ता। कसया विकास खंड के वृद्धाश्रम में रहने वाली बुजुर्ग माताओं ने इस पवित्र रिश्ते को एक बार फिर जीवित करते हुए अपने बेटों के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत रखा। यह व्रत उन बेटों के लिए है जिन्होंने कभी उनकी गोद में खेला, जिन्हें प्यार और देखभाल के साथ बड़ा किया, लेकिन

वृद्धाश्रम की माताएं निर्जला जीवित्पुत्रिका व्रत करते हुए, बेटे की लंबी आयु के लिए प्रार्थना करतीं, आंखों में आंसू लिए भावुक हो रही हैं।

वृद्धाश्रम की माताओं का जीवित्पुत्रिका व्रत: मातृत्व का अनोखा स्वरूप ममता कभी नहीं बदलती

सुबह 3 बजे से ही ये माताएं निर्जला व्रत पर बैठ गईं, बिना पानी के, केवल अपने बेटों की लंबी उम्र और सलामती के लिए प्रार्थना करती हुईं। एक मां के लिए उसका बेटा हमेशा सबसे बड़ा खजाना होता है, चाहे बेटा कैसा भी व्यवहार करे। ये माताएं अब वृद्धाश्रम में अपना जीवन बिता रही हैं, लेकिन उनकी ममता आज भी उतनी ही अडिग है जितनी तब थी जब उनके बेटे छोटे थे।

वृद्धाश्रम की इन माताओं के दिलों में अपने बेटों के लिए वही प्यार और ममता है जो हमेशा रही है। वे ईश्वर से अपने बेटों की खुशियों की दुआ मांग रही हैं, चाहे बेटे उन्हें भूल चुके हों या अपने जीवन में उन्हें अकेला छोड़ दिया हो। यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ममता की एक जीवंत मिसाल है।

वृद्धाश्रम की माताओं का जीवित्पुत्रिका व्रत: उमड़ आईं भावनाएं

व्रत के दौरान, जब भी माताएं अपने बेटों का नाम लेती हैं, उनकी आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं। वे उन पुरानी यादों में खो जाती हैं जब उनके बेटे छोटे थे और उनका हर कदम उनकी देखरेख में बढ़ा करता था। आज, वे वृद्धाश्रम की दीवारों में कैद हैं, पर उनका दिल अपने बेटों के लिए धड़कता है।

मैंने हमेशा सोचा था कि मेरा बेटा बड़ा होकर मुझे सहारा देगा,”* एक वृद्धा ने कहा, *”लेकिन आज मैं यहां हूं, और वह अपनी दुनिया में व्यस्त है।”* यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं, लेकिन उनकी आवाज में उम्मीद की हल्की झलक भी थी।

समाज के लिए आईना: बेटों की बेरुखी पर माताओं की ममता

यह घटना सिर्फ वृद्धाश्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज को एक बड़ा संदेश देती है। ये माताएं, जिन्होंने अपने जीवन का हर पल अपने बच्चों की भलाई में समर्पित किया, आज उसी समाज में अकेली रह रही हैं। बेटों की बेरुखी ने उन्हें वृद्धाश्रम की चारदीवारी में कैद कर दिया है, लेकिन उनकी ममता और प्यार कभी कम नहीं हुआ।

यह समाज के उस तबके के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी सवाल उठाती है जो हमें जीवन के हर मोड़ पर संभालता है, लेकिन हम उन्हें उस समय छोड़ देते हैं जब उन्हें हमारी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। समाज का विकास तब ही संभव है जब हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें और अपने माता-पिता की देखभाल करें।

ममता की अटूट शक्ति: माताएं नहीं छोड़तीं उम्मीद

वृद्धाश्रम में रह रही इन माताओं के दिलों में उम्मीद अब भी बाकी है। वे अपने बेटों के लिए प्रार्थना करती हैं और विश्वास रखती हैं कि एक दिन उनके बेटे उन्हें वापस अपनाएंगे। *”मेरा बेटा आएगा,”* एक अन्य वृद्धा ने कहा, *”मैं जानती हूं, वो आएगा।”* यह उम्मीद ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। वे आज भी मानती हैं कि जिस ममता और प्यार से उन्होंने अपने बच्चों को पाला, वह एक दिन उन्हें वापस उनकी ओर खींच लाएगा।

इन माताओं की कहानियों में एक गहरा दर्द छिपा है, लेकिन इसके साथ ही उसमें एक अडिग विश्वास और ममता की ताकत भी है। समाज चाहे कितना भी बदल जाए, ममता और मातृत्व का यह रूप कभी नहीं बदलेगा।

बेरुखी के बाद भी ममता का दामन नहीं छोड़तीं माताएं

ये माताएं उन बेटों के लिए प्रार्थना कर रही हैं जिन्होंने अपने जीवन की भागदौड़ में उन्हें भूलकर वृद्धाश्रम भेज दिया है। भले ही समाज में उनकी बेरुखी पर सवाल उठे हों, लेकिन माताओं की ममता और दुआएं हमेशा उनके बेटों के साथ हैं। *”मैं जानती हूं कि उन्होंने मुझे यहां क्यों छोड़ा,”* एक वृद्धा ने कहा, *”लेकिन मैं उनसे नाराज नहीं हूं। हर मां अपने बच्चों की भलाई ही चाहती है।”* यह कहते हुए उनकी आंखों में दर्द भी था और ममता भी।

समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश

वृद्धाश्रम की माताओं का जीवित्पुत्रिका व्रत: माताएं निर्जला जीवित्पुत्रिका व्रत करते हुए, बेटे की लंबी आयु के लिए प्रार्थना करतीं, आंखों में आंसू लिए भावुक हो रही हैं
माताओं ने रखा व्रत

यह कहानी सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि समाज के लिए एक गहरा संदेश है। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे माता-पिता हमारे जीवन का आधार हैं। जब वे वृद्ध हो जाते हैं, तो उनकी देखभाल और सम्मान हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए। आज का समाज भले ही आधुनिकता की ओर बढ़ रहा हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी जड़ें हमारे परिवार में हैं।

वृद्धाश्रम की इन माताओं की कहानी हमें सिखाती है कि ममता और प्यार की कोई सीमा नहीं होती। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपने बुजुर्गों के प्रति अपने कर्तव्यों का सही तरीके से निर्वाह कर रहे हैं?