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मैनपुरी जनसुनवाई: फरियादी मां-बेटी को न्याय के बदले हथकड़ी

मैनपुरी जिले के किशनी तहसील में जनसुनवाई के दौरान एक महिला और उसकी बेटी को न्याय मांगने के बजाय जेल भेजने का मामला सामने आया है। भूमि विवाद की शिकायत लेकर आई राधा देवी और उनकी बेटी ने जिलाधिकारी अंजनी कुमार सिंह के सामने अपनी बात रखने की कोशिश की। आरोप है कि न्याय मिलने के बजाय उन्हें पुलिस हिरासत में ले लिया गया। इस घटना ने प्रशासन की कार्यशैली और जनसुनवाई जैसे मंच पर नागरिकों के साथ होने वाले व्यवहार को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

मैनपुरी जनसुनवाई:मैनपुरी में जनसुनवाई के दौरान फरियादी मां-बेटी पर प्रशासनिक कार्रवाई का विवाद।
मैनपुरी जनसुनवाई: पुलिस हिरासत में माँ -बेटी

ये था पूरा मामला

राधा देवी और उनकी बेटी का आरोप था कि गांव के कुछ दबंगों ने उनकी जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया है। पीड़ितों का कहना है कि इस संबंध में पहले निशानदेही हो चुकी थी, लेकिन कब्जा हटाने की कार्रवाई नहीं हुई। लगातार अधिकारियों के पास चक्कर काटने के बाद वे जनसुनवाई में अपनी शिकायत लेकर पहुंचीं।

जनसुनवाई  के दौरान ऐसे हुआ विवाद

महिला और उनकी बेटी ने अपनी शिकायत को जोर देकर पेश किया। उन्होंने कथित तौर पर आत्महत्या करने की धमकी भी दी, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गई। जिलाधिकारी और शिकायतकर्ताओं के बीच तीखी बहस हुई, जिसके बाद डीएम ने पुलिस को स्थिति संभालने का आदेश दिया।

पुलिस कार्रवाई

पुलिस ने राधा देवी और उनकी बेटी को शांति भंग की धारा में गिरफ्तार कर लिया और थाने ले जाकर चालान किया। हालांकि, बाद में उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया।

मामला चर्चा में आने के बाद प्रशासन ने दी ये सफाई

घटना के बाद जिलाधिकारी अंजनी कुमार सिंह ने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने किसी को जेल भेजने का आदेश नहीं दिया। उन्होंने दावा किया कि महिला और उनकी बेटी ने आत्महत्या की धमकी दी थी, जिससे सुरक्षा कारणों से उन्हें पुलिस के हवाले किया गया। डीएम ने यह भी कहा कि शिकायत की जांच जारी है और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए उचित कदम उठाए जाएंगे।

 मां-बेटी के साथ हुई घटना के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया के माध्यम से प्रशासन पर लगा ये आरोप 

घटना के बाद सोशल मीडिया पर यह मामला तेजी से वायरल हो गया। प्रशासन पर जनता के साथ दुर्व्यवहार और न्याय न मिलने के आरोप लगने लगे। लोगों का कहना है कि फरियादी महिलाएं बार-बार अधिकारियों के पास न्याय की गुहार लगाने गई थीं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

सरकार की मंशा पर फिरा पानी, प्रशासन की कार्यशैली पर उठे सवाल

यह घटना सरकार की एंटी-भूमाफिया टास्कफोर्स की मंशा और उसके प्रभाव को लेकर सवाल खड़े करती है। अगर फरियादी बार-बार न्याय के लिए दौड़-धूप कर रही थीं, तो क्यों उनकी समस्या को गंभीरता से नहीं लिया गया? आत्महत्या की धमकी देने जैसी घटनाएं प्रशासन की निष्क्रियता और पीड़ितों के मानसिक तनाव को उजागर करती हैं।

डीएम के मुताबिक अगर आत्महत्या की धमकी दी गई थी, तो तत्काल इस मामले की गहराई से जांच करना और पीड़ितों को आश्वासन के बजाय वास्तविक न्याय देना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए थी। लेकिन इस घटना में ऐसा कोई प्रयास नहीं दिखता, जो प्रशासन की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

निष्कर्ष

मैनपुरी की इस घटना ने जनसुनवाई जैसे मंच पर प्रशासन की जिम्मेदारी और नागरिकों के अधिकारों के प्रति उसके रवैये पर नई बहस छेड़ दी है। प्रशासन को चाहिए कि वह न केवल इस मामले में पारदर्शिता से कार्रवाई करे बल्कि यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में फरियादियों के साथ ऐसा व्यवहार न हो।