🚧 हमीरपुर यमुना पुल विवाद: मरम्मत की आड़ और अमानवीय दृश्य
शनिवार सुबह, हमीरपुर के NH‑34 पर यमुना पुल की मरम्मत के चलते स्थानीय प्रशासन ने पुल को वाहन आवागमन के लिए बंद कर दिया था।
सुबह 9:30 बजे, जब बिंदा नामक एक युवक अपनी मां शिव देवी (63) का शव लेकर कानपुर से आ रहा था, तो एंबुलेंस को पुल पार करने की इजाज़त नहीं मिली।
यही संवेदनहीनता का पहला संकेत था जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया।
🧍♂️ हमीरपुर: बेटे की मजबूरी और दर्दनाक यात्रा
जब शव वाहन पुल पार नहीं हो पाया, तो बिंदा ने अपने ही हाथों मां का शव स्ट्रेचर पर रखा और करीब 1 किमी पैदल चलते हुए पुल पार किया।
उन्होंने बताया कि वो कई बार थककर बैठ चुका, लेकिन मजबूरी ने उसे बढ़ने को मजबूर किया। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोग भावुक हो उठे।
मरम्मत के बावजूद भी कुछ नेताओं की गाड़ियाँ पुल से गुजर गईं, जिस पर स्थानीय लोगों में भारी नाराज़गी है
⚖️ हमीरपुर: प्रशासन और मरम्मत का दोहरा रुख
यमुना पुल पर मरम्मत कार्य केवल शनिवार-रविवार को ही होता है और इसके लिए फोरलेन को बंद रखा गया है।
लेकिन असल में, अत्यावश्यक परिस्थितियों के लिए कोई सहूलियत नहीं दी गई।
पुलिस ने केवल पैदल जाने वालों को अनुमति दी, जबकि उनका सिस्टम एमरजेंसी वाहन और मानव संवेदनाओं को नजरअंदाज करता रहा
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🔊 हमीरपुर: स्थानीय आक्रोश और नैतिक कटुता
स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर भारी आक्रोश देखा गया –
“सब नियम सिर्फ आम लोगों के लिए, नेताओं के लिए खास सुविधा!”
“मानवता शर्मसार हुई।”
“सिस्टम ने बेटे की मजबूरी पर ठहाका लगाया।”
स्थानीय मीडिया भी पूछ रहा है – “क्या एंबुलेंस को भी पास मिलना चाहिए था?”
🏛️ क्या हुआ नेतृत्व और सिस्टम?
स्थानीय प्रशासन से कई सवाल उठते हैं:
क्या विवशता की स्थिति में छूट देने का किसी प्रणाली में प्रावधान होना चाहिए?
क्या मरम्मत के दौरान एमरजेंसी गाड़ियों के लिए बैराज हटाने का इंतज़ाम किया गया था?
स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि इसे सिस्टम में अमानवीय प्रावधान नाम दिया जाए और जिम्मेदारों पर कार्यवाही हो।
📝 न्याय की गुंजाइश और मानवता की उम्मीद
यह घटना सिर्फ एक इंसानी दर्द की कहानी नहीं, बल्कि प्रशासनिक असंवेदनशीलता का प्रतीक भी है।
हम उम्मीद करते हैं कि यह मामले समझदारी, सहानुभूति और कार्रवाई की नींव बनेगा, ताकि भविष्य में मानव जीवन सर्वोच्चता का हक रख सके।