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कांवड़ यात्रा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: रेस्टोरेंट ने पहले नॉन-वेज परोसा था या नहीं, ग्राहक को जानने का पूरा अधिकार

कांवड़ यात्रा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला – अब हर रेस्टोरेंट को बताना होगा, पहले नॉन-वेज सर्व करता था या नहीं, ग्राहक का अधिकार सर्वोपरि

नई दिल्ली 22 जुलाई 2025
कांवड़ यात्रा के दौरान कुछ रेस्टोरेंट्स द्वारा अपने खाने के मेन्यू में बदलाव और नॉन-वेज से पूरी तरह शाकाहारी बनाने को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई रेस्टोरेंट धार्मिक कारणों से या कांवड़ यात्रा के समय अस्थायी रूप से नॉन-वेज से वेज में बदलाव करता है, तो ग्राहकों को यह जानकारी देना अनिवार्य होना चाहिए कि वह पहले नॉन-वेज सर्व करता था या नहीं।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ एक याचिका की सुनवाई कर रही थी, जिसमें रेस्टोरेंट्स और सार्वजनिक खानपान सेवाओं में खाद्य सामग्री की पारदर्शिता और धार्मिक भावनाओं से जुड़ी कुछ आशंकाओं को लेकर चिंता जताई गई थी।

कांवड़ यात्रा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: क्या है पूरा मामला?

यह पूरा मामला ‘अपूर्वानंद झा व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य’ शीर्षक से दाखिल एक याचिका पर आधारित है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से आग्रह किया था कि देश में विशेष रूप से धार्मिक अवसरों के दौरान रेस्टोरेंट्स द्वारा अचानक शाकाहारी होने की प्रवृत्ति पर निगरानी रखी जाए, क्योंकि यह न केवल उपभोक्ताओं को भ्रमित करता है, बल्कि उनकी धार्मिक आस्थाओं को भी प्रभावित कर सकता है।

इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने माना कि हर ग्राहक को यह जानने का मौलिक अधिकार है कि वह जिस रेस्टोरेंट में खा रहा है, वहां पहले क्या परोसा जाता था – शाकाहारी या मांसाहारी।

कांवड़ यात्रा की पृष्ठभूमि में आया ये मुद्दा

गौरतलब है कि सावन महीने में उत्तर भारत में लाखों की संख्या में कांवड़ यात्री हरिद्वार, ऋषिकेश और गंगोत्री जैसे धार्मिक स्थलों से गंगाजल लाकर शिव मंदिरों में चढ़ाते हैं। इस दौरान अनेक दुकानदार और रेस्टोरेंट्स अस्थायी रूप से पूरी तरह शाकाहारी मेन्यू अपना लेते हैं।

हाल ही में गाज़ियाबाद, मेरठ और मुज़फ्फरनगर जैसे शहरों में कुछ हिंदू संगठनों ने रेस्टोरेंट्स पर दबाव बनाकर उन्हें नॉन-वेज बंद करने के लिए कहा था। कुछ मामलों में तो रेस्टोरेंट संचालकों को ‘वेजिटेरियन सर्टिफिकेट’ लगाने तक को मजबूर किया गया।

कांवड़ यात्रा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को उपभोक्ता अधिकारों और खाद्य सुरक्षा अधिनियम से जोड़ते हुए कहा:

“अगर कोई प्रतिष्ठान धार्मिक कारणों या किसी विशेष अवसर (जैसे कांवड़ यात्रा) के लिए अपने मेन्यू में बदलाव करता है, तो उसे यह बताना अनिवार्य होना चाहिए कि वह पहले क्या सर्व करता था। यह उपभोक्ता के अधिकारों से जुड़ा सवाल है।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश किसी धर्म विशेष के विरुद्ध नहीं है, बल्कि पारदर्शिता और उपभोक्ता हितों की रक्षा के उद्देश्य से है।

कांवड़ यात्रा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कानून की नजर में उपभोक्ता का अधिकार

वर्तमान में भारत में खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (FSSA) के तहत रेस्टोरेंट्स को अपने खाद्य पदार्थों की श्रेणी – जैसे शाकाहारी, मांसाहारी, अंडा, आदि – को स्पष्ट करना होता है। साथ ही, FSSAI द्वारा निर्धारित गाइडलाइंस के अनुसार प्रत्येक खाद्य वस्तु की जानकारी और उसके घटकों की सूची ग्राहक को उपलब्ध कराना अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से अब रेस्टोरेंट्स को यह भी खुलासा करना होगा कि उनके संस्थान ने पहले क्या परोसा था, ताकि कोई धार्मिक या नैतिक भ्रम की स्थिति पैदा न हो।

समाज में कैसा है इसका असर?

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश में ‘फूड पॉलिसिंग’ (food policing) का मुद्दा लगातार चर्चा में रहा है। कुछ संगठनों द्वारा ज़बरदस्ती किसी क्षेत्र विशेष को शुद्ध शाकाहारी क्षेत्र घोषित करना और रेस्टोरेंट्स पर दबाव डालना लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल उठाता रहा है।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संतुलन बनाने वाला है, जो न तो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है और न ही उपभोक्ता की जानकारी के अधिकार को नजरअंदाज करता है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और सामाजिक दृष्टिकोण

सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व सूचना आयुक्त प्रो. अपूर्वानंद ने कहा, “इस तरह की पारदर्शिता से लोगों को अपने धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार भोजन चयन करने में मदद मिलेगी। मगर यह भी ज़रूरी है कि इस फैसले का इस्तेमाल किसी विशेष समुदाय के खिलाफ न हो।”

दूसरी ओर, कुछ हिंदू संगठनों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि यह धार्मिक अवसरों की पवित्रता बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

भविष्य के लिए क्या संकेत देता है यह निर्णय?

यह निर्णय केवल कांवड़ यात्रा तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अब यह मुद्दा नवरात्रि, रमजान, पितृपक्ष जैसे अन्य धार्मिक अवसरों पर भी उठ सकता है, जहां खाने की आदतें विशेष रूप से प्रभावित होती हैं।

इस फैसले के बाद अब FSSAI जैसे नियामक संस्थानों को भी अपनी गाइडलाइंस अपडेट करनी पड़ सकती हैं, ताकि रेस्टोरेंट्स से पूर्व और वर्तमान भोजन संबंधी जानकारी ग्राहकों को देना अनिवार्य बनाया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश उपभोक्ता अधिकारों की दिशा में एक अहम कदम है। यह फैसला न केवल खाद्य पारदर्शिता को सुनिश्चित करता है, बल्कि धार्मिक संवेदनाओं और सामाजिक सौहार्द को भी संतुलित करता है।

अब यह रेस्टोरेंट उद्योग, नियामक एजेंसियों और आम जनता – तीनों की ज़िम्मेदारी है कि वे इस निर्देश को सही भावना से लागू करें और किसी भी प्रकार की सांप्रदायिकता या दबाव की स्थिति से बचें।

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