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रीवा में जन्मा विकृत शिशु: स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल

रीवा के ढखरा गांव में विकृत शिशु का जन्म, अल्ट्रासाउंड नॉर्मल, झोलाछाप डॉक्टर और कुपोषण ने खोली ग्रामीण स्वास्थ्य तंत्र की बड़ी खामियां

रीवा जिले के सोहागी थाना अंतर्गत ढखरा गांव में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। सातवें महीने में समय से पहले हुए प्रसव में प्रियंका सिंह (पति पुष्पराज सिंह) ने एक विकृत शिशु को जन्म दिया। यह घटना न केवल परिवार बल्कि चिकित्सा समुदाय के लिए भी हैरान करने वाली रही, क्योंकि गर्भावस्था के दौरान हुई अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट्स पूरी तरह नॉर्मल थीं।

जन्म के बाद की भयावह तस्वीर ने रुला दिया सभी को

जन्म के तुरंत बाद बच्चे की हालत देखकर हर कोई सन्न रह गया। उसकी दोनों आंखें बंद थीं, एक कान, एक हाथ और एक पैर अधूरा था। त्वचा मोटी और फटी हुई थी, और उसकी नाजुक हालत ने डॉक्टरों को भी असहज कर दिया। बच्चे को तुरंत चाकघाट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से रेफर कर संजय गांधी अस्पताल भेजा गया, जहां गहन चिकित्सा इकाई में उसकी जान बचाने की कोशिशें जारी हैं। डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे मामले 10,000 में से एक बार सामने आते हैं।

अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट्स ने क्यों नहीं दी चेतावनी?

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि प्रियंका की गर्भावस्था के दौरान की गई दो अल्ट्रासाउंड जांचें पूरी तरह सामान्य बताई गई थीं। डॉक्टरों ने परिवार को यह भी भरोसा दिलाया था कि डिलीवरी समय से दो महीने बाद होगी। लेकिन अचानक सातवें महीने में हुए प्रसव ने न केवल परिवार को झकझोर दिया, बल्कि यह सवाल खड़ा कर दिया कि आधुनिक तकनीक के बावजूद विकृत शिशु का समय रहते पता क्यों नहीं चल सका?

गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में छिपा खतरा

गायनोलॉजिस्ट डॉ. मोहिता पांडेय बताती हैं कि गर्भधारण के 18 से 55 दिन के बीच शिशु के अंगों का विकास होता है। इसी समय अगर गर्भवती महिला बिना डॉक्टर की सलाह के दवाएं खाती है, एक्स-रे विकिरण के संपर्क में आती है, उम्र अधिक होती है या पोषण की कमी झेलती है, तो भ्रूण का विकास प्रभावित हो सकता है। उनके अनुसार, गर्भ के पांचवें महीने में की जाने वाली सोनोग्राफी से इन विकारों का समय रहते पता चल सकता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह जांचें अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती हैं।

झोलाछाप डॉक्टरों और कुपोषण की मार

चाकघाट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ. नीरज चतुर्वेदी का कहना है कि झोलाछाप डॉक्टरों द्वारा दी जाने वाली दवाइयां और गर्भवती महिलाओं में कुपोषण, ऐसे मामलों की मुख्य वजह बनते हैं। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की नियमित जांच और विशेषज्ञ देखभाल की कमी भी इन त्रासदियों को जन्म देती है।

स्वास्थ्य तंत्र और जागरूकता पर उठते सवाल

यह घटना दो बड़े मुद्दों को सामने लाती है। पहला, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता—जहां अक्सर जांच और इलाज केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। दूसरा, गर्भवती महिलाओं की जागरूकता की कमी—जिसके चलते वे झोलाछाप डॉक्टरों और बिना पर्ची वाली दवाओं पर निर्भर हो जाती हैं, जो भ्रूण के लिए घातक साबित होती हैं।

रीवा की यह घटना: पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी

रीवा का यह मामला सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की खामियों का आईना है। आधुनिक सुविधाएं मौजूद होने के बावजूद, जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की सच्ची निगरानी, पोषण पर ध्यान और झोलाछाप प्रथाओं पर रोक नहीं लगती, तब तक ऐसे दर्दनाक और दुर्लभ मामले सामने आते रहेंगे। यह घटना समाज और प्रशासन दोनों के लिए चेतावनी है कि समय रहते कदम न उठाए गए तो ऐसी चीखें गांव-गांव में गूंजती रहेंगी।

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