राधिका अष्टमी 2025: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को श्री राधा रानी का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। मान्यता है कि आज से लगभग 5200 वर्ष पूर्व मथुरा जिले के गोकुल-महावन के समीप स्थित “रावल गांव” में दोपहर 12 बजे अनुराधा नक्षत्र के समय महाराज वृषभानु और माता कीर्तिदा के घर में श्री राधिका जी का प्राकट्य हुआ।
इस तरह से हुआ था राधा रानी का जन्म
शास्त्रों के अनुसार राधा रानी का जन्म साधारण रूप से नहीं हुआ था। कहा जाता है कि उनकी माता ने गर्भ में केवल वायु को धारण किया था और देवी योगमाया की प्रेरणा से श्री राधा जी प्रकट हुईं। वहीं, दूसरी कथा में वर्णन मिलता है कि वृषभानु जी को सरोवर के पास एक बालिका कमल के फूल पर तैरती हुई मिली, जिसे उन्होंने अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया।
जन्म के समय सम्पूर्ण दिशाएँ निर्मल हो उठीं और वृषभानु-कीर्तिदा ने अपनी पुत्री के कल्याण हेतु ब्राह्मणों को दो लाख उत्तम गौएं दान कीं। राधा जी के अभिषेक के समय सभी देवताओं ने पुष्पवर्षा कर उनका स्वागत किया। देवताओं ने विचार किया कि राधा रानी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की अधीश्वरी हैं, अतः वृंदावन को उनसे भी विशेष महत्व प्रदान किया जाए। इसी कारण से वृंदावन को बैकुंठ से भी अधिक महत्व प्राप्त हुआ।
श्री कृष्ण भगवान से बड़ी थी श्री राधा रानी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार राधा जी, श्रीकृष्ण से ग्यारह माह बड़ी थीं। किंतु जन्म के बाद उन्होंने अपनी आंखें नहीं खोलीं। यह देखकर वृषभानु जी और कीर्तिदा चिंतित हो उठे। बाद में जब यशोदा जी अपने बालक श्रीकृष्ण को लेकर उनके घर पहुंचीं और राधा-कृष्ण आमने-सामने हुए, तब पहली बार राधा जी ने अपनी आंखें खोलीं। उन्होंने अपने प्राणप्रिय श्रीकृष्ण के दर्शन किए और उन्हें निहारती ही रह गईं।
इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि श्री राधा और श्रीकृष्ण का संबंध अद्वितीय और अनन्य है। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा था कि राधा साहित्य, भक्ति और प्रेम की आत्मा होंगी। इसीलिए राधा जी को केवल श्रीकृष्ण की प्रियतमा ही नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम की सर्वोच्च प्रतिमा माना जाता है।
राधिका अष्टमी का पर्व हमें यह संदेश देता है कि सच्चा प्रेम त्याग, समर्पण और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक होता है। आज के दिन भक्तजन व्रत, कीर्तन और भक्ति गीतों के माध्यम से राधा रानी और श्रीकृष्ण का स्मरण कर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।