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NGT और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को ठेंगा! पीलीभीत की LHSF लोगों की जिंदगी से कर रही खिलवाड़, सरकारी सिस्टम मौन!

पीलीभीत की LHSF पर जहरीला केमिकल युक्त पानी नालों में बहाने के आरोप। ग्रामीणों ने फसल बर्बादी, बीमारियों और प्रदूषण को लेकर उठाए गंभीर सवाल।

NGT और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को ठेंगा! जहरीले पानी से लोगों की जिंदगी से खिलवाड़?

जब सिस्टम सो रहा हो और व्यवस्थाएं निकम्मी साबित हों, तो उसका दर्द आम जनता को भुगतना पड़ता है। इसका जीता-जागता उदाहरण पीलीभीत की एलएच शुगर मिल है, जिस पर स्थानीय लोगों ने सीधा आरोप लगाया है कि वह एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को ठेंगा दिखाकर धड़ल्ले से केमिकल युक्त जहरीला पानी नालों में बहाने का काम कर रही है।

 नियम क्या कहते हैं और सवाल क्यों उठ रहे हैं?

खबर में आगे बढ़ने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि देश में औद्योगिक इकाइयों द्वारा छोड़े जाने वाले प्रदूषित जल को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर सख्त दिशा-निर्देश जारी करते रहे हैं। इन दिशा-निर्देशों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी उद्योग बिना शोधन किए हुए जहरीले अपशिष्ट जल को खुले नालों, खेतों, नदियों अथवा जलस्रोतों में पानी की एक बूंद भी फैक्ट्री से बाहर नहीं निकाल सकती है। सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में साफ कह चुका है कि प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर “Polluter Pays Principle” यानी “प्रदूषण फैलाने वाला ही उसकी कीमत चुकाएगा”

लेकिन सवाल यह है कि क्या पीलीभीत में इन आदेशों का कोई मतलब बचा है?

आखिर क्या है पूरा मामला?

आइए जानलेते हैं कि यह पूरा मामला क्या है?

दरअसल शहर पीलीभीत से सटी ललित हरि शुगर मिल, जो कागजों में उत्तर प्रदेश की प्रमुख औद्योगिक इकाइयों में गिनी जाती है, आज गंभीर सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई दे रही है। स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि फैक्ट्री प्रशासन की लापरवाही और निकम्मी व्यवस्था ने आसपास की कॉलोनियों और दर्जनों गांवों के लोगों का जीवन नर्क बना  दिया है।

पीड़ित ग्रामीणों का कहना है कि मिल से निकलने वाला केमिकल युक्त काला, जहरीलाऔर बदबूदार पानी खुले नालों में छोड़ा जा रहा है। यही पानी खेतों से होते हुए अंततः देवहा नदी तक पहुंच रहा है। लोगों का आरोप है कि इस जहरीले पानी ने न सिर्फ किसानों की फसलें बर्बाद की हैं, बल्कि बेजुबान पशुओं में भी गंभीर बीमारियों पैदा कर दीं हैं। इतना ही नहीं कई पशुओं की मौत भी हो चुकी है।

ग्रामीणों की पीड़ा यहीं खत्म नहीं होती।

उनका कहना है कि वर्षों से बह रहे इस दूषित पानी के कारण क्षेत्र में तमाम गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं। जोशी कॉलोनी के लोगों का दावा है कि दूषित जल और प्रदूषण के कारण कई लोग कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां भी हो चुकी हैं।

कार्रवाई या सिर्फ दिखावा?

प्रशासन की कार्रवाई सिर्फ दिखावा है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह कोई नया मामला नहीं है। बीते वर्षों में प्रशासन द्वारा इस पानी के बहाव को बंद कराने की कार्रवाई की गई। जिले के बड़े नेताओं से लेकर जिले के आला अधिकारियों तक ने सख्त कार्रवाई के दावे किए। लेकिन सवाल यह है कि यदि कार्रवाई हुई तो जहरीला पानी फिर नालों में कैसे बहने लगा।

हर बार कुछ दिनों के लिए पानी बंद कराया जाता है और फिर मामला ठंडा पड़ते ही नियमों को ताक पर रखकर वही खेल दोबारा शुरू हो जाता है। यह एक फैक्ट्री की मनमानी नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल है।

इस जहरीले से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में जोशी कॉलोनी, गौहनिया, पिपरवाले नंबर-2, गुटैया, जंगरोली पुल, मथूडांडी नवबदिया समेत कई गांवों का नाम सामने आया है।

इन क्षेत्रों के लोगों का आरोप है कि नलों का पानी पीला और दूषित हो चुका है। खेतों में सिंचाई प्रभावित हो रही है। पशु बीमार पड़ रहे हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ रहा है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह जहरीला पानी अंततः देवहा नदी में जाकर गिरता है, जिसे पीलीभीत की लाइफलाइन माना जाता है।

यदि वास्तव में बिना शोधन किया हुआ औद्योगिक अपशिष्ट यानी दूषित पानी इसमें छोड़ा जा रहा है तो इसका असर सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि नदी के जलीय जीव, मछलियां, वन्य जीवन, भूजल और पर्यावरण का पूरा संतुलन प्रभावित हो सकता है।

पर्यावरण विशेषज्ञ वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि औद्योगिक प्रदूषण का सबसे बड़ा नुकसान आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इस पानी को रोकने के लिए जिम्मेदार एजेंसियां क्या कर रही हैं।

और सिस्टम खामोश क्यों है?

 जिम्मेदार कौन—फैक्ट्री या सिस्टम?

क्या यह केवल एक फैक्ट्री की लापरवाही है

या फिर सरकारी तंत्र की उदासीनता भी इस पूरे मामले को बढ़ावा दे रही है

या फिर पैसे की ताकत के आगे जिम्मेदार विभागों की कार्रवाई बौनी साबित हो रही है।

ग्रामीणों, किसानों और आम नागरिकों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं रह गई?

ये वे सवाल हैं जिनका जवाब अब पीलीभीत की जनता जानना चाहती है।

जिलाधिकारी ने क्या कहा?

इस पूरे मामले को लेकर पीलीभीत के जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि फैक्ट्री द्वारा बहाए जा रहे केमिकल युक्त पानी की जानकारी हमारे संज्ञान में आई है।

हमने मामले की जांच के लिए चार सदस्यीय टीम गठित कर दी गई है। जांच रिपोर्ट आने के बाद जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर कठोर कार्रवाई की जाएगी।

 क्या इस बार होगी बड़ी कार्रवाई?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह जांच भी उन तमाम जांचों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगी या फिर इस बार वास्तव में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी, या फिर किसानों की बर्बाद होती फसलें, बीमार होते पशु, दूषित होते जलस्रोत और ग्रामीणों की पीड़ा किसी ठोस परिणाम तक पहुंचेगी,

या फिर एक बार फिर कुछ दिनों का शोर होगा, कुछ नोटिस जारी होंगे, कुछ अधिकारियों और नेताओं बयान आएंगे और उसके बाद जहरीला पानी उसी तरह बहता रहेगा?