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क्या भगवान लिखता है लड़कियों की क़िस्मत? — या समाज अपने हाथों से उनकी तक़दीर रौंद देता है

क्या सच में भगवान लड़कियों की क़िस्मत लिखता है या समाज उनकी तक़दीर रौंद देता है? महिला अपराध, सोच और चुप्पी पर झकझोरने वाला विश्लेषण।

क्या भगवान लिखता है लड़कियों की क़िस्मत? — या समाज अपने हाथों से उनकी तक़दीर रौंद देता है

एक असहज सवाल, जो हर ज़मीर को झकझोरता है

जब भी किसी मासूम बच्ची के साथ बलात्कार होता है, जब किसी बेटी को ज़िंदा जला दिया जाता है, जब किसी युवती के शरीर के टुकड़े कर दिए जाते हैं — तब अक्सर एक वाक्य समाज में उछाल दिया जाता है, “क़िस्मत में लिखा था।” लेकिन सवाल यह है कि अगर सच में भगवान ही लड़कियों की क़िस्मत लिखते, तो क्या तीन साल की बच्ची के हिस्से में दरिंदगी आती? क्या किसी माँ‑बाप की बेटी का जीवन सरेआम कुचल दिया जाता?

यह लेख उसी भ्रम को तोड़ने की कोशिश है — कि यह भाग्य नहीं, बल्कि हमारा समाज, हमारी सोच, हमारी चुप्पी और हमारी व्यवस्था है, जो लड़कियों की तक़दीर को लहूलुहान कर रही है।

जब आंकड़े इंसान बन जाते हैं, कुछ घटनाएँ जो ज़मीर हिला देती हैं

आंकड़े तब और भयावह हो जाते हैं, जब उनके पीछे छिपे चेहरे सामने आते हैं।

तीन साल की बच्ची, जिसे खेलने के बहाने उठाया गया, घंटों बाद गंभीर हालत में अस्पताल पहुँची। वह न तो यह समझ पाई कि उसके साथ क्या हुआ, न यह कि गलती किसकी थी — लेकिन जीवन भर का डर उसके भीतर बैठ गया।

एक कॉलेज छात्रा, जिसने अपने ही परिचित पर भरोसा किया, उसी भरोसे की कीमत उसने अपनी अस्मिता से चुकाई। जब वह थाने पहुँची, तो सवाल अपराधी से नहीं, उसके कपड़ों और देर रात बाहर होने से जुड़े थे।

एक विवाहित महिला, जो घरेलू हिंसा और यौन शोषण की शिकार थी, सामाजिक ‘इज़्ज़त’ के नाम पर चुप रहने को मजबूर की गई। जब उसने आवाज़ उठाई, तो परिवार और पड़ोस ने ही उससे दूरी बना ली।

एक नाबालिग किशोरी, जिसे ऑनलाइन दोस्ती के जाल में फँसाया गया, ब्लैकमेल किया गया और बार‑बार शोषण झेलना पड़ा। तकनीक अपराधी के हाथ में हथियार बन गई।

ये अलग‑अलग घटनाएँ नहीं हैं — ये उसी मानसिकता की कड़ियाँ हैं, जो अपराध को छुपाती और पीड़िता को अकेला छोड़ देती है।

भारत में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ अपराध, कड़वे लेकिन ज़रूरी तथ्य (2019–2023)

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आधिकारिक आंकड़े यह साफ़ बताते हैं कि भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध कोई इक्का‑दुक्का घटना नहीं, बल्कि एक लगातार बढ़ती सामाजिक त्रासदी है।

पिछले 5 वर्षों में महिलाओं के खिलाफ कुल अपराध

2019: लगभग 4.05 लाख मामले दर्ज

2020: लगभग 3.71 लाख मामले (कोरोना और लॉकडाउन के बावजूद)

2021: लगभग 4.28 लाख मामले

2022: लगभग 4.45 लाख मामले

2023: लगभग 4.48 लाख मामले

इन आंकड़ों का अर्थ साफ़ है — हर साल औसतन चार लाख से ज़्यादा महिलाएं और लड़कियाँ हिंसा, शोषण और अत्याचार का शिकार हुईं। यह केवल दर्ज मामलों की संख्या है, असल सच्चाई इससे कहीं ज़्यादा भयावह हो सकती है।

बलात्कार: हर दिन लुटती हुई इज़्ज़त, हर रात टूटी हुई नींद

2021 में 31,000 से अधिक बलात्कार के मामले — यानी औसतन हर दिन 85–90 बलात्कार

2023 में भी लगभग 30,000 मामले दर्ज।

सबसे डराने वाला तथ्य यह है कि अधिकांश मामलों में अपराधी पीड़िता का जानकार होता है — रिश्तेदार, पड़ोसी, शिक्षक, सहकर्मी या भरोसे का व्यक्ति।

यही वजह है कि कई पीड़िताएँ शिकायत करने से डरती हैं — क्योंकि अपराधी घर के भीतर ही होता है।

मासूमियत पर हमला, POCSO के तहत दर्ज बाल अपराध

2023 में POCSO अधिनियम के तहत 40,000 से अधिक बच्चों के साथ यौन अपराध दर्ज हुए

इनमें बड़ी संख्या 3 से 14 वर्ष की बच्चियों की है — जिनकी दुनिया किताबों, खेल और सपनों की होनी चाहिए थी, न कि अस्पतालों और अदालतों की।

यहाँ सवाल सीधा है — क्या यह क़िस्मत है, या हमारी सामूहिक असफलता?

किन राज्यों में हालात सबसे ज़्यादा चिंताजनक

उत्तर प्रदेश

महाराष्ट्र

राजस्थान

पश्चिम बंगाल

मध्य प्रदेश

यह सूची किसी एक क्षेत्र को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए है कि समस्या देशव्यापी है

न्याय की धीमी रफ्तार, अपराध के बाद भी पीड़ा का अंत नहीं

75–78% मामलों में चार्जशीट दाख़िल होती है,

लेकिन 80–90% से अधिक केस वर्षों तक लंबित रहते हैं।

इस देरी का असर पीड़िता के मन, परिवार और भविष्य पर पड़ता है। कई बार वह अपराध से ज़्यादा इंतज़ार से टूट जाती है

तो क्या यह सच में क़िस्मत है?

नहीं। यह क़िस्मत नहीं है।

यह उस समाज की देन है —

जो बेटियों को चुप रहना सिखाता है,

जो अपराधी से पहले पीड़िता पर शक करता है,

जो ‘इज़्ज़त’ को इंसाफ़ से ऊपर रखता है,

और जो सब कुछ देखकर भी ख़ामोश रहता है।

भगवान ने किसी लड़की की तक़दीर में दरिंदगी नहीं लिखी —ये  हमने लिखी है।

समाधान की राह, समाज और सरकार क्या करें

समाज की ज़िम्मेदारी

लड़कों को बचपन से सम्मान और सहमति (Consent) की शिक्षा

पीड़िता‑दोषी मानसिकता का अंत

अपराध देखकर आवाज़ उठाना

रिश्तों में जवाबदेही

सरकार और व्यवस्था की ज़िम्मेदारी

समयबद्ध और संवेदनशील न्याय

फास्ट‑ट्रैक कोर्ट की प्रभावी संख्या

पुलिस‑जांच की जवाबदेही

स्कूलों में लैंगिक संवेदनशीलता की अनिवार्य पढ़ाई

 तक़दीर बदली जा सकती है

अगर समाज ठान ले, अगर व्यवस्था ईमानदार हो, अगर हर नागरिक जिम्मेदारी निभाए — तो किसी भी लड़की की तक़दीर बदली जा सकती है।

यह लड़ाई भगवान से नहीं, हमारी सोच से है। और जब सोच बदलेगी — तभी क़िस्मत भी बदलेगी।

यह लेख समाज को नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले जाने का एक प्रयास है — ताकि आने वाली पीढ़ी की बेटियाँ डर नहीं, सम्मान के साथ जी सकें।

यह लेख किसी सरकार या पुलिस पर आरोप नहीं, बल्कि समाज की आत्मा से सवाल है

इस लेख को लिखने का उद्देश्य न तो किसी सरकार को कटघरे में खड़ा करना है, न पुलिस या सुरक्षा व्यवस्था को दोष देना। यह लेख दरअसल उस सामाजिक सोच पर सवाल है, जो हर जघन्य अपराध के बाद सबसे पहले पीड़िता की चुप्पी, उसके कपड़े, उसके समय और उसके चरित्र को जांचने लगती है। जब तक समाज अपनी इस मानसिकता को नहीं बदलेगा, तब तक कानून, सजा और अदालतें भी अधूरी साबित होंगी। यह लेख हमें यह समझाने की कोशिश करता है कि अपराध सिर्फ अपराधी नहीं करता — उसे बढ़ावा हमारी चुप्पी, हमारी सहमति और हमारी उदासीनता भी देती है। अगर समाज समय रहते अपनी सोच बदल ले, तो न जाने कितनी बेटियों की ज़िंदगी बिखरने से बच सकती है।

पीलीभीत: योगी सरकार की लघु सिंचाई योजना से खेतों तक पहुँचा पानी, किसानों की बदली तकदीर