पीलीभीत में बड़े खाद घोटाले की अशंका! नियमों को ताक पर रखकर यूरिया-डीएपी की जमकर बिक्री, प्रशासन सख्त
जनपद पीलीभीत में किसानों के नाम पर खाद की बिक्री में बड़ा खेल सामने आया है। जिला कृषि विभाग की सख्त समीक्षा में यह खुलासा हुआ है कि जब खेतों में विशेष मांग नहीं थी, तब भी कई खाद विक्रेताओं ने नियमों को दरकिनार कर भारी मात्रा में यूरिया और डीएपी की बिक्री कर दी। यह सिर्फ अनियमितता नहीं, बल्कि सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करने वाला मामला बन गया है। प्रशासन ने इसे गंभीरता से लेते हुए कई खाद विक्रेताओं के लाइसेंस निलंबित कर दिए हैं और अब कठोर कार्रवाई की तैयारी है।
आइए विस्तार से समझते हैं पूरा मामला—
12 दिन की गहन जाँच में खुली पोल
जिला कृषि अधिकारी द्वारा आईएफएमएस पोर्टल के माध्यम से 01 अप्रैल 2026 से 12 अप्रैल 2026 के बीच उर्वरकों की बिक्री का गहन जांच की गयी।
इस जांच में साफ तौर पर पाया गया कि कई समितियों और निजी विक्रेताओं ने जरूरत से कहीं ज्यादा खाद की बिक्री की, जबकि उस समय कोई विशेष सीजनल मांग नहीं थी।
यानी जहां सामान्य वितरण होना चाहिए था, वहां असामान्य रूप से भारी उठान दर्ज किया गया।
किन-किन प्रतिष्ठानों पर गिरी गाज
जांच में जिन प्रमुख संस्थानों के नाम सामने आए, उनमें शामिल हैं:
- एफएससी पीलीभीत
- सहकारी गन्ना विकास समिति पीलीभीत
- सहकारी गन्ना विकास समिति मझोला
- सहकारी समिति टोडरपुर
- सहकारी गन्ना विकास समिति बीसलपुर
- शिवम खाद भंडार पूरनपुर
- सिंह फर्टिलाइजर पूरनपुर
- शर्मा खाद भंडार घुघचाई
- दीक्षित फर्टिलाइजर
- बाला जी फर्टिलाइजर
- गगन एग्रीजंक्शन (मझोला)
- आईएफएफडीसी केएसके घुपतपुर
- किसान खाद भंडार
- कृषक बहुउद्देश्य सहकारी समिति
- किसान सेवा सहकारी समिति जोगीठेर
- सहकारी समिति रायपुर बिचपुरी
- भारत पेस्टीसाइड
- किसान सेवा सहकारी समिति अमरिया
- शंकर एंटरप्राइजेज (जोगराजपुर)
- किसान सेवा सहकारी समिति ललौरीखेड़ा
- ग्राम स्तरीय उद्यमी कल्याण
- आईएफएफडीसी केएसके कढेर चौराहा
- सहकारी समिति खरगापुर
इन सभी पर यूरिया की अत्यधिक बिक्री का आरोप सामने आया है।
डीएपी में भी गड़बड़ी, नियमों का खुला उल्लंघन
सिर्फ यूरिया ही नहीं, बल्कि डीएपी खाद की बिक्री में भी अनियमितता सामने आई है।
खास तौर पर:
- एफएससी पीलीभीत
- सहकारी समिति टोडरपुर
- किसान सेवा सहकारी समिति जोगीठेर
- सहकारी गन्ना विकास समिति पीलीभीत
- सहकारी गन्ना विकास समिति मझोला
- सहकारी गन्ना विकास समिति बीसलपुर
इन संस्थानों द्वारा डीएपी की अत्यधिक बिक्री दर्ज की गई।
क्या होना चाहिए था और क्या हुआ?
क्या होना चाहिए था:
- किसानों की वास्तविक जरूरत के अनुसार सीमित मात्रा में खाद वितरण
- प्रति किसान निर्धारित सीमा के भीतर बिक्री
- डिजिटल पोर्टल पर पारदर्शी और संतुलित एंट्री
क्या हुआ:
- बिना मांग के भारी मात्रा में खाद उठान
- एक-एक किसान को 30-30 बैग तक खाद की बिक्री
- नियमों की अनदेखी और संभावित कालाबाजारी की आशंका
यह स्थिति साफ संकेत देती है कि कहीं न कहीं सिस्टम का दुरुपयोग हुआ है।
एक किसान को 30-33 बैग तक खाद! चौंकाने वाले आंकड़े
जांच में कुछ बेहद चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए:
- सहकारी गन्ना विकास समिति मझोला द्वारा 30 किसानों को 18-20 बैग यूरिया दिया गया
- बाला जी खाद भंडार (बिलसंडा) द्वारा 1 किसान को 33 बैग
- यूपीएसएस माधोपुर (अमरिया) द्वारा 1 किसान को 32 बैग
- वर्मा खाद भंडार द्वारा 1 किसान को 30 बैग
ये सभी मामले स्पष्ट रूप से नियमों के खिलाफ हैं और बड़े स्तर पर गड़बड़ी की ओर इशारा करते हैं।
प्रशासन का एक्शन: लाइसेंस निलंबित, जांच शुरू
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने:
- संबंधित विक्रेताओं के उर्वरक प्राधिकार पत्र (लाइसेंस) निलंबित कर दिए हैं
- सभी मामलों में गहन जांच शुरू कर दी गई है
साथ ही साफ कर दिया गया है कि
दोषी पाए जाने पर प्राधिकार पत्र निरस्त किया जाएगा
और कठोर वैधानिक कार्रवाई भी की जाएगी
संभावित खेल: कालाबाजारी या सिस्टम की खामी?
जांच के अनुसार इस पूरे मामले में कई सवाल उठते हैं:
- क्या खाद की कालाबाजारी की जा रही थी?
- क्या किसानों के नाम पर फर्जी एंट्री की गई?
- या फिर सिस्टम की निगरानी में कहीं चूक हुई?
इन सभी पहलुओं पर अब प्रशासन की नजर है।
किसानों के हितों से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं
प्रशासन का साफ संदेश है कि
किसानों के हक का खाद किसी भी कीमत पर गलत हाथों में नहीं जाने दिया जाएगा
और जो भी इस खेल में शामिल पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई तय है
सख्ती से ही रुकेगा खाद माफियाओं का खेल
पीलीभीत में सामने आया यह मामला केवल अनियमितता नहीं, बल्कि एक बड़े नेटवर्क की संभावना को दर्शाता है।
अब देखना यह होगा कि
जांच में और कौन-कौन फंसता है
और क्या प्रशासन इस पूरे खेल की जड़ तक पहुंच पाता है
लेकिन इतना तय है कि अगर समय रहते ऐसी गड़बड़ियों पर लगाम नहीं लगाई गई, तो इसका सीधा नुकसान गरीब और जरूरतमंद किसानों को ही उठाना पड़ेगा।