PILIBHIT: कभी-कभी सरकारी दफ्तरों में ऐसी कहानियां भी जन्म लेती हैं, जो सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि इंसानियत की मिसाल बन जाती हैं। पीलीभीत में शुक्रवार को ऐसा ही एक दृश्य देखने को मिला।
जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह अपने कार्यालय में लोगों की समस्याएं सुन रहे थे। तभी दरवाजे से एक करीब 14 साल का दुबला-पतला लड़का अंदर आया। उसके दोनों हाथों में उसकी दो छोटी बहनों का हाथ था। एक बहन मुश्किल से 7 साल की होगी और दूसरी करीब 9 साल की। तीनों के चेहरे पर डर था… आंखों में आंसू थे… और दिल में सिर्फ एक उम्मीद कि शायद यहां से उन्हें कोई सहारा मिल जाए।
‘साहब… अब हमारे मां-बाप नहीं हैं’
कमरे में पहुंचते ही उस बच्चे ने धीमी आवाज में कहा, “साहब… हमारे मां-बाप अब इस दुनिया में नहीं हैं… हमारी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है।”
इतनी सी बात सुनते ही पूरे कमरे का माहौल बदल गया। इतनी छोटी उम्र में बहनों की जिम्मेदारी उठाने वाले उस भाई की बेबसी हर किसी को भीतर तक झकझोर गई।
DM ने पहले बच्चों की भूख देखी, फिर उनकी पूरी जिंदगी की चिंता
जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह ने बिना एक पल गंवाए बच्चों को अपने पास बुलाया। पहले उन्हें बिस्कुट, चॉकलेट और पानी दिया। शायद उन्हें एहसास था कि किसी भी मदद से पहले इन मासूमों को यह महसूस कराना जरूरी है कि अब वे अकेले नहीं हैं।
इसके बाद उन्होंने जिला प्रोबेशन अधिकारी को तुरंत बुलाया और मौके पर ही पूरी व्यवस्था करने के निर्देश दिए। इतना ही नहीं, अपनी ओर से आर्थिक सहायता भी दी, ताकि बच्चों की तत्काल जरूरतें पूरी हो सकें।
अधिकारियों को सीधे गांव भेजा… कागजों का इंतजार नहीं कराया, सारी सुविधाएं एक साथ दिलवाईं
अक्सर लोग सरकारी प्रक्रियाओं में दिनों और महीनों तक भटकते हैं, लेकिन इस बार कहानी अलग थी।
जिलाधिकारी ने उपजिलाधिकारी कलीनगर और बीडीओ पूरनपुर को तुरंत गांव जाने का आदेश दिया। कुछ ही देर में प्रशासनिक टीम बच्चों के साथ उनके गांव राजपुर महराजपुर पहुंच गई।
गांव के पंचायत भवन में अधिकारी, ग्राम प्रधान और ग्रामीण इकट्ठा हुए। वहीं बच्चों के माता-पिता के मृत्यु प्रमाण पत्र तत्काल जारी किए गए। राशन की व्यवस्था हुई और जन्म प्रमाण पत्र बनवाने की प्रक्रिया भी उसी समय शुरू कर दी गई।
सिर्फ इन तीन बच्चों की नहीं… गांव के दो और अनाथ बच्चों की जिंदगी भी बदल गई
जब अधिकारी गांव पहुंचे तो पता चला कि वहां दो और बच्चे भी ऐसे हैं, जिनके सिर से माता-पिता का साया उठ चुका है।
जिलाधिकारी के निर्देश पर उन दोनों बच्चों के भी मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना के लिए ऑनलाइन आवेदन उसी समय करा दिए गए।
यानी एक बच्चे की मदद की गुहार ने गांव के पांच बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने की राह खोल दी।
शाम हुई… लेकिन इंसानियत का सफर नहीं रुका
दिनभर की व्यस्तता के बाद ज्यादातर लोग अपने घर लौट जाते हैं, लेकिन जिलाधिकारी का दिन अभी खत्म नहीं हुआ था।
शाम को वह चिडियादाह गांव में रहने वाली श्रीमती ताराबेगम के घर पहुंचे।
ताराबेगम ने अपने पति को खो दिया… फिर बेटे को भी। अब उनके पास सिर्फ दो छोटे-छोटे पोते हैं, जिन्हें उनकी मां भी छोड़कर चली गई। एक बुजुर्ग दादी अपने बूढ़े कंधों पर दो मासूम बच्चों का भविष्य उठाए बैठी थीं।
बुजुर्ग दादी से कहा- अब सरकार आपके साथ है
जिलाधिकारी ने मौके पर ही उनके पति और बेटे का मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करवाया। आय प्रमाण पत्र जल्द बनवाने के निर्देश दिए, ताकि पेंशन शुरू हो सके।
उन्होंने अपनी ओर से आर्थिक सहायता भी दी और अधिकारियों को तुरंत राशन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। साथ ही दोनों बच्चों को मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना से जोड़ने की प्रक्रिया भी शुरू करवा दी।
उस वक्त ताराबेगम की आंखों में सिर्फ आंसू नहीं थे… बल्कि कई दिनों बाद उम्मीद भी दिखाई दे रही थी।
संवेदनशील प्रशासन सिर्फ आदेश नहीं देता… जिंदगी भी बदल देता है
सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोगों की पहचान अक्सर उनके आदेशों से होती है, लेकिन कुछ फैसले ऐसे भी होते हैं जो सीधे लोगों के दिलों तक पहुंच जाते हैं।
पीलीभीत में शुक्रवार को ऐसा ही हुआ। एक 14 साल का भाई अपनी बहनों का हाथ पकड़कर मदद मांगने आया था। शाम तक उन बच्चों को सिर्फ राशन और आर्थिक सहायता ही नहीं मिली, बल्कि उनके भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में भी कदम उठ चुके थे।
शायद यही वजह है कि लोग कहते हैं…
“जब प्रशासन संवेदनशील हो, तो सरकारी दफ्तर सिर्फ कार्यालय नहीं रहते… वे बेसहारों के लिए उम्मीद का दरवाजा बन जाते हैं।”
I have started working as a crime reporter in 2011 for a daily local newspaper named ‘Khusro Mail’. I have also worked for many news organization such as Public Vibe app and Oneindia Hindi news portal. Now I am working as Editor In Chief for Rocket Post Bharat (rocketpostbharat.com).