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Shri Krishna Janmashtami पर जानिए भगवान कृष्ण से जुड़ी रोचक कथाएं; किसने दिया था मोरपंख, बांसुरी और सुदर्शन चक्र?

Shri Krishna Janmashtami पर जानिए भगवान कृष्ण से जुड़ी रोचक कथाएं; किसने दिया था मोरपंख, बांसुरी और सुदर्शन चक्र?

Shri Krishna Janmashtami आज देशभर में मनाई जा रही है। सूर्योदय से लेकर रात तक अष्टमी तिथि रहने के कारण मथुरा, वृंदावन, द्वारका, पुरी समेत ज्यादातर मंदिरों में आज ही भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। मान्यता है कि भगवान कृष्ण का जन्म रात के आठवें मुहूर्त में हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी पर आधी रात में कृष्ण जन्मोत्सव मनाने की परंपरा है। 4-5 सितंबर की रात 12:00 बजे से 12:48 बजे तक आठवां मुहूर्त बताया गया है।

जन्माष्टमी के मौके पर भगवान कृष्ण की पूजा के साथ उनकी बांसुरी, मोरपंख और सुदर्शन चक्र से जुड़ी पौराणिक कथाएं भी काफी खास मानी जाती हैं। आइए जानते हैं जन्माष्टमी पर पूजा की पूरी विधि और कृष्ण से जुड़ी इन प्रमुख कथाओं के बारे में।

जन्माष्टमी पर कैसे करें श्रीकृष्ण की पूजा?

जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा विधि-विधान से करने की परंपरा है। जो लोग रात 12 बजे भगवान का जन्मोत्सव मनाते हैं, वे उस समय विशेष पूजा कर सकते हैं। हालांकि, जो लोग रात में पूजा नहीं कर पाते हैं, वे अष्टमी तिथि के दौरान दिन में भी किसी समय श्रीकृष्ण की पूजा कर सकते हैं।

जन्माष्टमी पूजा के लिए जरूरी सामग्री

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पूजा के लिए इन चीजों को पहले से तैयार कर लें।

  • जल
  • दूध
  • पंचामृत
  • अक्षत यानी चावल
  • चंदन
  • अबीर
  • गुलाल
  • जनेऊ
  • हार-फूल
  • फल
  • सूखे मेवे
  • नारियल
  • मिठाई
  • तुलसी पत्र
  • धूप-दीप
  • माखन-मिश्री
  • पान

सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें

पूजा की शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके करें। इसके बाद उनकी मूर्ति पर अक्षत और फूल चढ़ाएं। धूप-दीप जलाएं और भगवान का स्मरण करते हुए पूजा शुरू करें।

जल, दूध और पंचामृत से करें अभिषेक

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक करें। इस दौरान “क्लीं कृष्णाय नमः” मंत्र का जाप करते हुए पहले जल, फिर दूध और पंचामृत से भगवान का अभिषेक किया जा सकता है।

भगवान कृष्ण का श्रृंगार करें

अभिषेक के बाद भगवान का श्रृंगार करें। उन्हें जनेऊ, चंदन, चावल, अबीर और गुलाल अर्पित करें। इसके बाद भगवान को नए वस्त्र पहनाएं और आभूषणों से सजाएं।

माखन-मिश्री और मिठाई का भोग लगाएं

श्रृंगार के बाद भगवान को हार-फूल अर्पित करें। फल, तुलसी पत्र, माखन-मिश्री, सूखे मेवे और मिठाई का भोग लगाएं। पूजा में पान भी अर्पित किया जाता है।

चंद्रमा को अर्घ्य दें

जन्माष्टमी की पूजा में चंद्रमा को अर्घ्य देने की भी परंपरा है। इसके साथ ही बलराम, माता यशोदा और गौ माता की मूर्ति की भी इसी प्रकार पूजा करने का विधान बताया गया है।

कपूर जलाकर आरती करें

पूजा के अंत में कपूर जलाकर भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें। भगवान की परिक्रमा करें और पूजा के दौरान हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा याचना करें। इसके बाद प्रसाद ग्रहण करें और परिवार व अन्य लोगों में प्रसाद वितरित करें। अंत में भजन-कीर्तन करें।

श्रीकृष्ण पूजा के 5 मंत्र

पूजा के दौरान इन मंत्रों का जाप किया जा सकता है।

  • श्रीकृष्णाय नमः।
  • ॐ अच्युताय नमः।
  • ॐ अनंताय नमः।
  • ॐ माधवाय नमः।
  • ॐ गोविंदाय नमः।

कृष्ण को बांसुरी किसने दी थी?

भगवान श्रीकृष्ण की पहचान उनकी बांसुरी और उसकी मधुर धुन से भी जुड़ी हुई है। दी गई पौराणिक जानकारी के अनुसार, कृष्ण को बांसुरी नंद बाबा ने दी थी। श्रीमद्भागवत के वेणुगीत के अनुसार, यमुना नदी के किनारे मौजूद बांस के पेड़ से कृष्ण की बांसुरी बनाई गई थी।

बांसुरी से जुड़ी है कृष्ण की खास पहचान

पौराणिक वर्णन में श्रीकृष्ण को सिर पर मोरपंख, कानों में कर्णिकार के फूल, पीले वस्त्र और वैजयंती माला पहने हुए वृंदावन में प्रवेश करते और बांसुरी बजाते हुए बताया गया है।

कृष्ण की बांसुरी की धुन इतनी मधुर मानी जाती है कि उसकी आवाज सुनकर वृंदावन की गायें अपने कान खड़े करके स्थिर हो जाती थीं। दूध पी रहे बछड़े भी मुंह में दूध लिए हुए कृष्ण की तरफ देखने लगते थे।

कृष्ण की बांसुरी की धुन पर मोर भी नाचते थे

कृष्ण की बांसुरी से जुड़ी मान्यता सिर्फ गायों और बछड़ों तक ही सीमित नहीं है। कहा जाता है कि उनकी बांसुरी की धुन सुनकर वृंदावन के मोर भी उनके आसपास इकट्ठा हो जाते थे।

कृष्ण बांसुरी बजाते थे और मोर उनकी धुन पर नृत्य करते थे। कृष्ण भी मोरों के बीच खड़े होकर उनके साथ गाते और नाचते थे। यही वजह है कि कृष्ण की बांसुरी को उनकी वृंदावन लीलाओं से जोड़कर देखा जाता है।

कृष्ण को मोरपंख किसने दिया था?

भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में लगा मोरपंख उनकी सबसे खास पहचान में शामिल है। इससे जुड़ी एक सुंदर पौराणिक कथा बताई जाती है।

छह साल की उम्र में बांसुरी बजाने लगे थे कृष्ण

मान्यता के अनुसार, जब श्रीकृष्ण करीब 6 साल के थे, तब वे बांसुरी बजाने लगे थे। वृंदावन में जब कृष्ण बांसुरी बजाते थे, तो उसकी मधुर धुन सुनकर मोर उनके चारों ओर इकट्ठा हो जाते थे।

कृष्ण की बांसुरी पर मोर करते थे नृत्य

कहा जाता है कि मोरों के आग्रह पर कृष्ण बांसुरी बजाते थे और मोर उनकी धुन पर नृत्य करते थे। कृष्ण भी मोरों के बीच खड़े होकर उनके साथ गाते और नाचते थे।

मोरों और कृष्ण के बीच इस तरह का जुड़ाव वृंदावन की कृष्ण लीलाओं का खास हिस्सा माना जाता है।

मोरों ने खुशी से कृष्ण को दिया अपना पंख

नृत्य पूरा होने के बाद मोर कृष्ण से प्रसन्न हुए। मान्यता के अनुसार, उन्होंने अपने सुंदर पंखों में से कुछ पंख कृष्ण को भेंट किए।

कृष्ण ने मोरों के इस उपहार को स्वीकार किया और उनमें से एक पंख अपनी पगड़ी में लगा लिया। इसी तरह मोरपंख धीरे-धीरे भगवान कृष्ण की वेशभूषा और उनकी पहचान से जुड़ गया।

आज भी भगवान कृष्ण की तस्वीरों और मूर्तियों में उनके मुकुट या पगड़ी पर मोरपंख जरूर दिखाई देता है।

श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र किसने दिया था?

भगवान कृष्ण के सुदर्शन चक्र को लेकर अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों में अलग-अलग विवरण मिलता है। इसलिए इस कथा को समझते समय यह देखना जरूरी है कि किस ग्रंथ में क्या वर्णन किया गया है।

महाभारत के अनुसार अग्निदेव ने दिया था दिव्य चक्र

महाभारत के अनुसार, अग्निदेव ने खांडव वन जलाने से पहले श्रीकृष्ण को एक दिव्य चक्र दिया था। इस चक्र की नाभि वज्र जैसी बताई गई है और महाभारत में इसे वज्रनाभ चक्र कहा गया है।

अग्निदेव को क्यों लेनी पड़ी कृष्ण और अर्जुन की मदद?

कथा के अनुसार, अग्निदेव खांडव वन को जलाना चाहते थे, लेकिन इंद्र अपने मित्र नागराज तक्षक की रक्षा के लिए बारिश करके हर बार आग बुझा देते थे।

अग्निदेव इस समस्या के कारण कृष्ण और अर्जुन के पास पहुंचे और उनसे सहायता मांगी। इसी प्रसंग में श्रीकृष्ण को दिव्य चक्र प्राप्त होने का वर्णन मिलता है।

सुदर्शन चक्र की शक्ति क्या बताई गई?

महाभारत के इस वर्णन के अनुसार, यह दिव्य चक्र बेहद शक्तिशाली था। बताया गया है कि यह मनुष्य, देवता, दैत्य, राक्षस, पिशाच और नागों को पराजित करने की क्षमता रखता था।

शत्रुओं का वध करने के बाद यह चक्र वापस श्रीकृष्ण के हाथ में लौट आता था। इसी वजह से इसे भगवान कृष्ण के प्रमुख दिव्य अस्त्रों में गिना जाता है।

श्रीमद्भागवत में मिलता है अलग वर्णन

वहीं, श्रीमद्भागवत में भगवान कृष्ण के जन्म का वर्णन अलग रूप में मिलता है। इसके अनुसार, कृष्ण जब जन्मे तो वे चक्र धारण किए हुए दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए थे।

देवकी और वासुदेव की प्रार्थना के बाद भगवान कृष्ण ने अपना दिव्य स्वरूप छोड़कर बाल रूप धारण किया। यानी सुदर्शन चक्र को लेकर महाभारत और श्रीमद्भागवत में विवरण एक जैसा नहीं है।

सुदर्शन चक्र को लेकर क्या समझना चाहिए?

इसलिए यह कहना ज्यादा उचित है कि महाभारत के अनुसार अग्निदेव ने कृष्ण को दिव्य चक्र दिया था, जबकि श्रीमद्भागवत में कृष्ण के जन्म के समय ही उनके चक्रधारी दिव्य स्वरूप का वर्णन मिलता है

धार्मिक और पौराणिक कथाओं में अलग-अलग ग्रंथों में अलग विवरण मिलना सामान्य है। इसलिए इन कथाओं को संबंधित ग्रंथों के संदर्भ के साथ ही देखना बेहतर है।

जन्माष्टमी पर कृष्ण की इन लीलाओं को क्यों याद किया जाता है?

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव है, लेकिन इस मौके पर उनकी बाल लीलाओं और उनसे जुड़ी पौराणिक कथाओं को भी याद किया जाता है। बांसुरी कृष्ण की मधुर वृंदावन लीलाओं से जुड़ी है, मोरपंख उनके स्वरूप और प्रकृति से जुड़े प्रेम का प्रतीक माना जाता है, जबकि सुदर्शन चक्र उनके दिव्य स्वरूप और शक्ति से जुड़ा प्रमुख प्रतीक है।

रात के समय जन्मोत्सव के दौरान भगवान कृष्ण की पूजा, अभिषेक और श्रृंगार करने के बाद आरती और भजन-कीर्तन किया जाता है। यही वजह है कि जन्माष्टमी को देशभर में बेहद उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।