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UP Mosque Demolition: कलेक्ट्रेट की मस्जिद पर क्यों चला बुलडोजर? 1911 के रिकॉर्ड, 6 करोड़ का जुर्माना; जानिए पूरा विवाद..

UP Mosque Demolition: कलेक्ट्रेट की मस्जिद पर क्यों चला बुलडोजर? 1911 के रिकॉर्ड, 6 करोड़ का जुर्माना; जानिए पूरा विवाद..

UP Mosque Demolition: सहारनपुर कलेक्ट्रेट में शनिवार सुबह उस वक्त हड़कंप मच गया, जब तड़के करीब 4 बजे प्रशासन की कार्रवाई शुरू हुई और करीब 6 बजे कलेक्ट्रेट परिसर में बनी मस्जिद को हटाने के लिए बुलडोजर पहुंच गए। कुछ ही देर में इलाके को पुलिस छावनी में बदल दिया गया। कलेक्ट्रेट के सभी प्रमुख गेट बंद कर दिए गए और चार बुलडोजरों की मदद से मस्जिद के हिस्से को गिराने की कार्रवाई शुरू हुई। मलबे को नगर निगम की गाड़ियों में भरकर मौके से हटाया गया। इस दौरान भारी पुलिस फोर्स के साथ आरआरएफ की कंपनियां भी तैनात रहीं।

यह मामला सिर्फ बुलडोजर एक्शन का नहीं है। इसके पीछे करीब डेढ़ साल से चल रहा जमीन के मालिकाना हक और मस्जिद के निर्माण की वैधता का कानूनी विवाद है। प्रशासन और अदालत के आदेशों के मुताबिक विवादित जमीन सरकारी है और उस पर बनी मस्जिद को अवैध निर्माण माना गया। दूसरी तरफ मस्जिद कमेटी का दावा है कि जमीन वक्फ की है और मस्जिद 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है। कमेटी ने पुराने दस्तावेजों का भी हवाला दिया। इसी विवाद के बीच अब 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 565 रुपये की क्षतिपूर्ति, कोर्ट के आदेश और राजनीतिक विरोध ने पूरे मामले को और बड़ा बना दिया है।

सहारनपुर कलेक्ट्रेट में मस्जिद को लेकर विवाद क्या है?

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद मस्जिद को लेकर विवाद पिछले करीब डेढ़ साल से चल रहा था। प्रशासन का कहना था कि जिस जमीन पर मस्जिद का निर्माण मौजूद है, वह सरकारी भूमि है। इसी आधार पर मामला सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचा।

विवाद का सबसे अहम सवाल यही था कि आखिर जिस जमीन पर मस्जिद मौजूद है, उसका मालिकाना हक किसके पास है। प्रशासन इसे सरकारी जमीन बता रहा था, जबकि मस्जिद कमेटी का दावा था कि यह जमीन वक्फ संपत्ति है।

जनवरी 2025 में शिकायत के बाद शुरू हुई जांच

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, जनवरी 2025 में कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को लेकर शिकायत की गई थी। इसके बाद प्रशासन ने जमीन से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड और दूसरे दस्तावेजों की जांच शुरू की।

शिकायत में सरकारी जमीन पर कथित तौर पर अनधिकृत कब्जे और निर्माण का मुद्दा उठाया गया था। इसी जांच के बाद मामला प्रशासनिक अदालत तक पहुंचा।

मार्च 2025 में PP Act के तहत पहुंचा मामला

जांच के बाद मार्च 2025 में राजस्व विभाग के एक लेखपाल की ओर से सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में आवेदन दिया गया। इसमें सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जे का आरोप लगाया गया।

इसके बाद मामला उत्तर प्रदेश लोक परिसर (अनधिकृत अध्यासियों की बेदखली) अधिनियम, 1972 यानी PP Act के तहत चला। अदालत की प्रक्रिया के दौरान संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए गए और मस्जिद पक्ष की ओर से जवाब और आपत्तियां भी दाखिल की गईं।

मस्जिद कमेटी ने क्या दावा किया?

मस्जिद कमेटी का कहना था कि यह कोई हाल का निर्माण नहीं है। कमेटी ने मस्जिद को करीब 150 साल पुराना बताया और दावा किया कि यहां लंबे समय से धार्मिक गतिविधियां होती रही हैं।

कमेटी ने जमीन को वक्फ संपत्ति बताते हुए अपने पक्ष में पुराने दस्तावेज भी अदालत के सामने रखे। यानी मस्जिद पक्ष का मूल तर्क यह था कि जिस जमीन को प्रशासन सरकारी बता रहा है, उसका धार्मिक इस्तेमाल बहुत लंबे समय से हो रहा है और जमीन वक्फ से जुड़ी है।

1911 के रिकॉर्ड का भी दिया गया हवाला

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस सांसद इमरान मसूद की ओर से भी पुराने रिकॉर्ड का हवाला दिया गया। ओवैसी ने सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया कि मस्जिद कमेटी ने अदालत में 1911 तक के रिकॉर्ड पेश किए थे।

मस्जिद पक्ष और विपक्षी नेताओं के मुताबिक, इन पुराने रिकॉर्ड से यह दिखाने की कोशिश की गई कि वहां एक सदी से ज्यादा समय से नमाज पढ़ी जाती रही है। हालांकि प्रशासन और अदालत के आदेश के मुताबिक, इन दावों को जमीन पर मालिकाना हक साबित करने के लिए पर्याप्त कानूनी साक्ष्य नहीं माना गया।

16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट का बड़ा आदेश

करीब डेढ़ साल चली प्रक्रिया के बाद 16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने इस मामले में फैसला दिया।

अदालत ने विवादित जमीन को सरकारी भूमि माना और कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद मस्जिद के निर्माण को अवैध माना। इसके साथ ही संबंधित पक्ष को परिसर खाली करने का आदेश दिया गया।

यही वह आदेश था जिसके बाद विवाद ने नया मोड़ लिया, क्योंकि मस्जिद कमेटी ने इसे चुनौती देने का फैसला किया।

315 वर्ग मीटर जमीन का है विवाद

मामले में विवादित जमीन का क्षेत्रफल करीब 315 वर्ग मीटर बताया गया है। प्रशासन और अदालत के मुताबिक यह जमीन सरकारी है और इसी सरकारी भूमि पर मस्जिद का निर्माण मौजूद था।

मस्जिद कमेटी इसके विपरीत जमीन को वक्फ संपत्ति बताती रही। इसलिए पूरे विवाद का सबसे बड़ा केंद्र जमीन का मालिकाना हक ही बना रहा।

6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 565 रुपये की क्षतिपूर्ति क्यों?

इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा जिस रकम की हुई, वह है 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 565 रुपये

सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने विवादित परिसर को सरकारी भूमि मानते हुए मस्जिद को अवैध निर्माण माना और परिसर खाली करने के आदेश के साथ इतनी बड़ी रकम की क्षतिपूर्ति भी तय की।

यानी मामला केवल सरकारी जमीन खाली कराने तक सीमित नहीं था। सरकारी जमीन के इस्तेमाल और कथित अनधिकृत कब्जे की अवधि के आधार पर क्षतिपूर्ति की रकम भी तय की गई।

मस्जिद कमेटी ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी

सिटी मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई के आदेश के बाद मस्जिद कमेटी ने जिला अदालत का रुख किया। कमेटी का तर्क था कि जमीन को वक्फ संपत्ति माना जाना चाहिए और मस्जिद लंबे समय से वहां मौजूद है।

कमेटी ने अदालत में अपने पुराने दस्तावेजों और जमीन से जुड़े दावों को रखा और सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी।

20 जुलाई को जिला अदालत में दाखिल हुई अपील

सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ मस्जिद प्रबंधन समिति ने 20 जुलाई 2026 को जिला अदालत में अपील दाखिल की। मामला जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत में पहुंचा।

इसके बाद करीब डेढ़ महीने तक मामले की सुनवाई चली। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस दौरान 17 तारीखों पर सुनवाई हुई और दोनों पक्षों ने अपने दस्तावेज, साक्ष्य और कानूनी दलीलें अदालत के सामने रखीं।

अगस्त में भी जारी रही सुनवाई

अगस्त 2026 में भी मामले की सुनवाई जारी रही। अतिरिक्त दस्तावेजों और साक्ष्यों को रिकॉर्ड पर लेने को लेकर दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं।

यानी 5 सितंबर की बुलडोजर कार्रवाई अचानक शुरू हुई कार्रवाई नहीं थी। इसके पीछे पहले से चल रही प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रिया थी।

2 सितंबर को जिला अदालत ने भी अपील खारिज कर दी

मामले में सबसे अहम मोड़ 2 सितंबर 2026 को आया। जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत ने मस्जिद कमेटी की फर्स्ट अपील खारिज कर दी।

जिला अदालत ने सिटी मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद प्रशासन के लिए मस्जिद हटाने की कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया।

प्रशासन का कहना था कि सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ मस्जिद कमेटी की पहली अपील भी खारिज हो चुकी है। सहारनपुर मंडल के डीआईजी अभिषेक सिंह ने भी कार्रवाई के बाद यही बात कही।

शुक्रवार रात से बढ़ने लगी पुलिस की तैनाती

2 सितंबर के जिला अदालत के फैसले के बाद सहारनपुर में राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई। शुक्रवार रात कलेक्ट्रेट के आसपास पुलिस की तैनाती बढ़ा दी गई।

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने देर रात लाइव आकर मस्जिद मामले पर अपनी बात रखी। उनके दामाद शायान मसूद ने भी घटनाक्रम से जुड़ी जानकारी साझा की।

सपा विधायक आशु मलिक, एमएलसी शाहनवाज खान समेत कई नेता कलेक्ट्रेट पहुंचे। हालांकि पुलिस ने नेताओं को कलेक्ट्रेट के गेट के बाहर ही रोक दिया। नेताओं की जिलाधिकारी अरविंद चौहान से मुलाकात भी हुई।

शनिवार तड़के 4 बजे शुरू हुई प्रशासन की कार्रवाई

शनिवार सुबह करीब 4 बजे प्रशासन ने मस्जिद को हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी। कलेक्ट्रेट परिसर में बाहरी लोगों की आवाजाही रोक दी गई और सभी प्रमुख गेट बंद कर दिए गए।

भारी पुलिस सुरक्षा के बीच बुलडोजर कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर पहुंचे। करीब 6 बजे मस्जिद के ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई।

चार बुलडोजरों से गिराया गया मस्जिद का हिस्सा

कार्रवाई के लिए मौके पर चार बुलडोजर लगाए गए। बुलडोजरों ने मस्जिद की दीवारों और निर्माण के दूसरे हिस्सों को गिराना शुरू किया।

सुबह तक मस्जिद का एक हिस्सा गिराया जा चुका था। इसके बाद मलबा हटाने का काम शुरू कर दिया गया। नगर निगम की गाड़ियों में मलबा भरकर उसे मौके से हटाया गया।

कलेक्ट्रेट को पुलिस ने घेरा, RRF भी तैनात

कार्रवाई के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर और आसपास के इलाके में भारी पुलिस फोर्स तैनात रही। सुरक्षा व्यवस्था में आरआरएफ की कंपनियां भी लगाई गईं।

सभी प्रमुख गेट बंद रखे गए और बाहरी लोगों की एंट्री पर रोक रही। प्रशासन ने यह सुरक्षा व्यवस्था किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए की थी।

त्योहारों को देखते हुए सुरक्षा बढ़ाने की बात

सहारनपुर मंडल के डीआईजी अभिषेक सिंह के मुताबिक, इस समय त्योहारों का दौर चल रहा है। इसलिए कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया।

डीआईजी ने सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी। प्रशासन की कोशिश थी कि कार्रवाई के दौरान किसी तरह की अफवाह या तनाव की स्थिति पैदा न हो।

इकरा हसन को क्यों किया गया हाउस अरेस्ट?

मस्जिद पर कार्रवाई से पहले राजनीतिक गतिविधियां भी तेज हो गई थीं। कैराना से सपा सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोकने के लिए रात में ही उनके कैराना स्थित आवास पर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया और उन्हें हाउस अरेस्ट कर दिया गया।

इकरा हसन के मुताबिक, वह सहारनपुर जाकर अधिकारियों से मिलना चाहती थीं और स्थानीय लोगों की बात उनके सामने रखना चाहती थीं। लेकिन उन्हें घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी गई।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या एक निर्वाचित सांसद को अपने क्षेत्र की जनता से जुड़े मुद्दे पर अधिकारियों से मिलने से रोका जा सकता है।

अवधेश प्रसाद ने भी कार्रवाई पर सवाल उठाए

सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने भी इकरा हसन और अन्य नेताओं को नजरबंद किए जाने की आलोचना की। उनका आरोप था कि जनप्रतिनिधियों को घटनास्थल पर जाने से रोकना लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने जैसा है।

हालांकि प्रशासन की ओर से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को कार्रवाई की वजह बताया गया।

इमरान मसूद ने कहा- यह सहारनपुर के लिए ‘काला दिन’

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने मस्जिद पर हुई कार्रवाई को लेकर सरकार और प्रशासन पर तीखा हमला बोला।

इमरान मसूद का दावा है कि मस्जिद 1911 से भी पहले की है और मस्जिद पक्ष ने पुराने रिकॉर्ड अदालत में पेश किए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि वक्फ से जुड़े दावों और ‘वक्फ बाय यूजर’ के पहलू को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

उन्होंने इस कार्रवाई को संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़ते हुए इसे सहारनपुर के लिए ‘काला दिन’ बताया। साथ ही कहा कि उनकी पार्टी कानून को अपने हाथ में नहीं लेगी और कानूनी रास्ते से लड़ाई जारी रखेगी।

ओवैसी ने भी उठाए वक्फ और जमीन के सवाल

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी मस्जिद गिराए जाने पर सवाल उठाए। ओवैसी ने दावा किया कि मस्जिद कमेटी ने अदालत में 1911 के दस्तावेज पेश किए थे और वहां एक सदी से ज्यादा समय से लगातार नमाज पढ़ी जा रही थी।

इसी आधार पर उन्होंने ‘वक्फ बाय यूजर’ का सवाल उठाया। उनका तर्क था कि अगर कोई धार्मिक स्थल लंबे समय से खुले तौर पर लगातार इस्तेमाल में रहा है, तो इतने लंबे समय बाद सरकार उस जमीन पर अपना दावा कैसे कर सकती है।

Limitation Act और adverse possession का भी सवाल

ओवैसी ने अपने तर्क में Limitation Act और adverse possession के सिद्धांत का भी हवाला दिया।

उन्होंने यह सवाल उठाया कि अगर मस्जिद कलेक्ट्रेट की मौजूदा व्यवस्था से भी पहले की है, तो जमीन के इतिहास को किस तरह देखा जाना चाहिए।

हालांकि यह मस्जिद पक्ष और ओवैसी की ओर से उठाए गए कानूनी सवाल हैं। दूसरी तरफ प्रशासन का रुख पूरी तरह अलग है। प्रशासन का कहना है कि जमीन सरकारी है, मस्जिद अवैध निर्माण है और अदालत के आदेश के बाद ही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई।

मस्जिद कितनी पुरानी है, इस पर भी अलग-अलग दावे

मस्जिद की उम्र को लेकर भी विवाद है। मस्जिद कमेटी और उसके समर्थन में खड़े नेताओं की ओर से इसे 100 साल से ज्यादा और करीब 150 साल पुरानी बताया गया है।

दूसरी तरफ उपलब्ध रिपोर्टों में इसे करीब 70 साल पुरानी बताए जाने का भी उल्लेख मिलता है। इसलिए इस खबर में मस्जिद की उम्र को लेकर किसी एक दावे को अंतिम तथ्य की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मस्जिद पक्ष पुराने दस्तावेजों और लंबे समय से धार्मिक इस्तेमाल का हवाला देता रहा, जबकि प्रशासन और अदालत के आदेशों में जमीन के सरकारी होने और निर्माण के अवैध होने को आधार बनाया गया।

क्या अदालत ने सीधे मस्जिद गिराने का आदेश दिया था?

मस्जिद पक्ष की ओर से इस प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए। मस्जिद के मुतवल्ली/प्रबंधन पक्ष का कहना रहा कि सिटी मजिस्ट्रेट ने परिसर खाली करने का आदेश दिया था, लेकिन सीधे ध्वस्तीकरण का अलग आदेश नहीं दिया गया था।

मस्जिद पक्ष ने यह भी सवाल उठाया कि जिला अदालत में अपील की प्रक्रिया और 30 दिन की अवधि को किस तरह देखा जाना चाहिए।

वहीं प्रशासन का कहना है कि सिटी मजिस्ट्रेट का आदेश कायम रहा और उसके खिलाफ दाखिल फर्स्ट अपील भी जिला अदालत ने खारिज कर दी। इसी न्यायिक स्थिति के आधार पर प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की।

आखिर विवाद का असली केंद्र क्या है?

पूरे मामले को समझने के लिए तीन सवाल सबसे अहम हैं।

पहला सवाल—जमीन किसकी है?
प्रशासन और सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने इसे सरकारी भूमि माना है। मस्जिद कमेटी इसे वक्फ संपत्ति बताती रही है।

दूसरा सवाल—मस्जिद कितनी पुरानी है और पुराने दस्तावेज क्या साबित करते हैं?
मस्जिद पक्ष का दावा है कि उसके पास 1911 के रिकॉर्ड हैं और वहां एक सदी से ज्यादा समय से नमाज पढ़ी जाती रही है। प्रशासन और अदालत के आदेश के मुताबिक, इन दावों को जमीन पर मालिकाना हक साबित करने के लिए पर्याप्त कानूनी साक्ष्य नहीं माना गया।

तीसरा सवाल—क्या मामला यहीं खत्म हो गया?
2 सितंबर को जिला जज की अदालत ने मस्जिद कमेटी की फर्स्ट अपील खारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद प्रशासन ने 5 सितंबर को ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की। हालांकि मस्जिद पक्ष और विपक्षी नेता आगे भी कानूनी रास्ता अपनाने की बात कह रहे हैं।

क्या है पूरी टाइमलाइन?

जनवरी 2025: कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद और जमीन को लेकर शिकायत के बाद प्रशासनिक जांच शुरू हुई।

मार्च 2025: राजस्व विभाग के लेखपाल की ओर से सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में मामला दाखिल हुआ और PP Act के तहत कार्रवाई शुरू हुई।

अप्रैल-जून 2025: संबंधित पक्षों को नोटिस जारी हुए और मस्जिद पक्ष की ओर से जवाब/आपत्तियां दाखिल की गईं।

16 जुलाई 2026: सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने विवादित जमीन को सरकारी माना, मस्जिद को अवैध निर्माण बताया, परिसर खाली करने का आदेश दिया और ₹6,41,65,565 की क्षतिपूर्ति तय की।

20 जुलाई 2026: मस्जिद कमेटी ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ जिला अदालत में फर्स्ट अपील दाखिल की।

जुलाई-अगस्त 2026: जिला अदालत में मामले की सुनवाई चली। करीब 17 तारीखों पर दलीलें और दस्तावेज सुने गए।

2 सितंबर 2026: जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत ने मस्जिद कमेटी की अपील खारिज कर सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा।

शुक्रवार रात: कलेक्ट्रेट के आसपास पुलिस तैनाती बढ़ी। कई नेता मौके पर पहुंचे, जबकि इकरा हसन ने अपने घर पर हाउस अरेस्ट किए जाने का आरोप लगाया।

5 सितंबर 2026, सुबह करीब 4 बजे: प्रशासन की कार्रवाई शुरू हुई और कलेक्ट्रेट के गेट बंद कर दिए गए।

सुबह करीब 6 बजे: चार बुलडोजरों की मदद से मस्जिद के निर्माण को गिराने की कार्रवाई शुरू हुई।

इसके बाद: मलबा नगर निगम की गाड़ियों से हटाया गया और इलाके में भारी पुलिस तथा आरआरएफ की तैनाती जारी रही।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल कलेक्ट्रेट परिसर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी है और ध्वस्तीकरण के बाद मलबा हटाने की कार्रवाई की गई है। पुलिस सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने वालों पर नजर रख रही है।

एक तरफ प्रशासन का कहना है कि उसने अदालत के आदेशों के अनुपालन में सरकारी जमीन पर मौजूद अवैध निर्माण को हटाया है। दूसरी तरफ मस्जिद कमेटी और विपक्षी नेता जमीन के वक्फ होने, पुराने दस्तावेजों, धार्मिक इस्तेमाल और कार्रवाई की कानूनी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

यानी सहारनपुर कलेक्ट्रेट की यह कहानी केवल एक बुलडोजर कार्रवाई की नहीं है। इसका असली विवाद सरकारी जमीन बनाम वक्फ का दावा, पुराने दस्तावेज, मस्जिद के निर्माण की वैधता, अदालतों के आदेश और उसके बाद हुई प्रशासनिक कार्रवाई के बीच है। अब आगे की कानूनी लड़ाई में इन दावों और सवालों पर क्या रुख सामने आता है, यही इस पूरे विवाद का अगला बड़ा अध्याय होगा।