CJP Protest: सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामले में नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही CJP प्रदर्शन से जुड़ी FIR रद्द कर चुका है और प्रदर्शन को लेकर छात्रों के खिलाफ भविष्य में जबरदस्ती की कार्रवाई पर रोक लगा चुका है, तो एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की। मामले में CJI ने जिला मजिस्ट्रेट से जवाब मांगने की बात कही है।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की?
बुधवार को सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने यह मामला उठाया गया। कोर्ट को बताया गया कि नोएडा कमिश्नरेट के थर्ड एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट आरके सिसोदिया ने छात्र अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी किया था।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी FIR रद्द कर दी हैं और विरोध प्रदर्शनों को लेकर किसी भी छात्र के खिलाफ भविष्य में जबरदस्ती की कार्रवाई पर रोक लगाई है, तो कोई भी मजिस्ट्रेट उस आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।
छात्र अक्षत त्रिपाठी को दिया गया था 5 लाख के बॉन्ड का नोटिस
दरअसल, 4 सितंबर 2026 को नोएडा कमिश्नरेट के थर्ड एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कार्यालय की ओर से अक्षत त्रिपाठी के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया गया था।
नोटिस में अक्षत से पूछा गया था कि क्यों न उन्हें 6 महीने तक शांति बनाए रखने के लिए पाबंद किया जाए। इसके लिए उनसे 5 लाख रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि के दो जमानतदार पेश करने को कहा गया था।
मामले में सुनवाई के लिए 5 सितंबर की तारीख तय की गई थी। मामला सुर्खियों में आने के बाद प्रशासन ने 6 सितंबर को नोटिस वापस ले लिया था।
नोटिस में छात्र पर क्या आरोप लगाए गए थे?
एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के नोटिस में कहा गया था कि यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि अक्षत त्रिपाठी विश्वविद्यालय के छात्रों को CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे।
नोटिस में यह भी आरोप लगाया गया था कि वह छात्रों के बीच सरकार विरोधी और भ्रामक सूचनाएं फैला रहे थे। ऐसी गतिविधियों से तनाव पैदा होने और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका जताई गई थी।
सुप्रीम कोर्ट में वकील ने उठाया मामला
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट विश्वजीत भट्टाचार्य ने मौखिक रूप से CJI की अध्यक्षता वाली बेंच को इस मामले की जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने एक छात्र को नोटिस जारी करके पूछा था कि शांति बनाए रखने के लिए उससे 5 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड क्यों न भरवाया जाए। वकील ने यह भी बताया कि बाद में नोटिस वापस ले लिया गया।
वकील बोले- भारत के छात्रों के साथ प्रयोग किया जा रहा
विश्वजीत भट्टाचार्य ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि यह भारत के छात्रों के साथ एक प्रयोग किया जा रहा है और इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना की गई और फिर नोटिस वापस ले लिया गया। उनके मुताबिक, इस तरह नोटिस वापस लेने से हुई अवमानना को सुधारा नहीं जा सकता।
वकील ने इसे कोर्ट की गरिमा की अवमानना बताते हुए कहा कि नोएडा और उत्तर प्रदेश के अधिकारी छात्रों के मन में डर का माहौल नहीं बना सकते।
CJI ने कहा- जिला मजिस्ट्रेट से जवाब मांगेंगे
वकील की दलील सुनने के बाद CJI सूर्यकांत ने भरोसा दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में जिला मजिस्ट्रेट से जवाब मांगेगा।
CJI की टिप्पणी से साफ है कि सुप्रीम कोर्ट अपने आदेश के बाद छात्रों के खिलाफ हुई इस तरह की कार्रवाई को गंभीरता से देख रहा है।
कौन हैं छात्र अक्षत त्रिपाठी?
अक्षत त्रिपाठी प्रयागराज के झूंसी के रहने वाले हैं। वह गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय (GBU) से BA-LLB की पढ़ाई कर रहे हैं।
अक्षत त्रिपाठी स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की उत्तर प्रदेश स्टेट कमेटी के सदस्य भी हैं।
उनके खिलाफ 4 सितंबर 2026 को नोएडा कमिश्नरेट के थर्ड एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कार्यालय से BNSS की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया गया था।
पुलिस ने बताया- जांच में अक्षत का नाम सामने आया था
ACP रवि शंकर के मुताबिक, जांच के दौरान अक्षत त्रिपाठी का नाम सामने आया था। पुलिस को पता चला था कि वह जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में शामिल होने के लिए गए थे।
पुलिस ने WhatsApp के जरिए छात्र को नोटिस भेजा था। ACP के मुताबिक, 5 सितंबर को नोटिस कैंसिल कर दिया गया।
पुलिस की छानबीन में बाद में यह बात सामने आई कि छात्र उस दौरान वहां मौजूद नहीं था।
ACP ने छात्र के पुराने वीडियो का भी किया जिक्र
ACP रवि शंकर ने यह भी बताया कि इससे पहले नवंबर में छात्र ने आत्महत्या करने की बात कहते हुए एक वीडियो बनाया था, जो वायरल हो गया था।
वीडियो वायरल होने के बाद छात्र गायब हो गया था। इसके बाद पुलिस ने उसकी तलाश की थी।
छात्र ने वीडियो जारी कर पूछा- क्या सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलना अपराध है?
मंगलवार को अक्षत त्रिपाठी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया। वीडियो में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद उन्हें CJP प्रदर्शन में शामिल होने के लिए धमकाया जा रहा है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या लोकतंत्र में सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलना या पेपर लीक जैसे मुद्दों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अपराध है?
अक्षत ने कहा कि इसी मामले में ग्रेटर नोएडा मजिस्ट्रेट की तरफ से उन्हें नोटिस मिला है, जिसमें 5 लाख रुपये का निजी बंधपत्र देने को कहा गया है। उन्होंने कहा कि वह एक छात्र हैं और उनकी कोई व्यक्तिगत आय नहीं है। ऐसे में इतनी बड़ी राशि की शर्त उनके लिए कैसे व्यावहारिक हो सकती है?
अक्षत ने आरोपों के आधार पर और सबूत पर सवाल उठाया
छात्र ने वीडियो में कहा कि नोटिस में आरोप लगाया गया है कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन में शामिल होकर उन्होंने विश्वविद्यालय के छात्रों को सरकार के खिलाफ भड़काया।
अक्षत ने सवाल किया कि सरकार की नीति की आलोचना करना, सरकार से सवाल पूछना या पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाना भड़काना कैसे हो गया?
उन्होंने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों का आधार और प्रमाण भी पूछा।
अक्षत बोले- करीब 3 महीने से विश्वविद्यालय नहीं गया
अक्षत त्रिपाठी ने वीडियो में दावा किया कि वह करीब 3 महीने से विश्वविद्यालय गए ही नहीं हैं। उन्होंने कहा कि 20 जुलाई के प्रदर्शन से करीब डेढ़ महीने पहले ही वह अपने घर इलाहाबाद आ चुके थे।
ऐसे में उनका सवाल था कि जब वह विश्वविद्यालय में मौजूद ही नहीं थे तो उन्होंने वहां के छात्रों को कैसे भड़काया?
अक्षत ने इस कार्रवाई की निंदा करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि सवाल सिर्फ उनका नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना अपराध है?
9 दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने CJP प्रदर्शन से जुड़ी FIR रद्द की थीं
यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने 9 दिन पहले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन से जुड़ी सभी FIR रद्द कर दी थीं।
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज मामलों पर लागू होगा।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि जिन प्रदर्शनकारियों का आपराधिक रिकॉर्ड है, उनके खिलाफ मामले चलते रहेंगे।
20 से 25 जुलाई के प्रदर्शन के बाद दर्ज हुई थीं FIR
CJP का प्रदर्शन 20 से 25 जुलाई के बीच जंतर-मंतर पर हुआ था। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पों के बाद कई FIR दर्ज की गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों पर सुनवाई करते हुए प्रदर्शन से जुड़े मामलों में कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने दिए थे 5 बड़े निर्देश
1. नई FIR पर रोक: सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 20 से 25 जुलाई के बीच हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़ी कोई नई FIR दर्ज नहीं की जाएगी।
2. 5 राज्यों में पुराने आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों पर केस जारी: दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र, बंगाल और असम में आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले चलते रहेंगे।
3. बाकी राज्यों में पुलिस कार्रवाई पर रोक: इन 5 राज्यों को छोड़कर बाकी जगहों पर ऐसी FIR में पुलिस न तो जांच आगे बढ़ाएगी और न ही कोई कार्रवाई करेगी।
4. NEET पेपर लीक पीड़ित परिवारों को मुआवजा: सरकार को NEET पेपर लीक के कारण सुनवाई करने वाले स्टूडेंट्स के परिवारों को मुआवजा देने का निर्देश दिया गया।
5. 2,873 लोगों के खिलाफ नई FIR की अनुमति: दिल्ली पुलिस को जंतर-मंतर पर मौजूद गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 2,873 व्यक्तियों के खिलाफ नई प्राथमिक FIR दर्ज करने की अनुमति दी गई।
अब नोएडा के मामले पर सुप्रीम कोर्ट की नजर
अक्षत त्रिपाठी को जारी किया गया नोटिस बाद में वापस लिया जा चुका है, लेकिन बुधवार की सुनवाई में यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। CJI सूर्यकांत की कड़ी टिप्पणी के बाद अब जिला मजिस्ट्रेट से जवाब मांगे जाने की बात कही गई है।
इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद विरोध प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर कार्रवाई की जा सकती है या नहीं। अब इस पर प्रशासन के जवाब का इंतजार है।
I have started working as a crime reporter in 2011 for a daily local newspaper named ‘Khusro Mail’. I have also worked for many news organization such as Public Vibe app and Oneindia Hindi news portal. Now I am working as Editor In Chief for Rocket Post Bharat (rocketpostbharat.com).