Kanwar Yatra 2026: हर साल कांवड़ यात्रा में ऐसे श्रद्धालु देखने को मिलते हैं, जो अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराते हैं और लोग उन्हें आधुनिक श्रवण कुमार कहते हैं। लेकिन इस बार हरिद्वार से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने लाखों लोगों का दिल जीत लिया। यहां एक बहू अपनी बुजुर्ग सास को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से उत्तर प्रदेश के हापुड़ तक करीब 170 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर रही है। इस अनोखी यात्रा में सबसे खास बात यह है कि परिवार की तीन पीढ़ियां एक साथ चल रही हैं। यह सिर्फ कांवड़ यात्रा नहीं, बल्कि सेवा, संस्कार और परिवार के प्रति समर्पण की मिसाल बन गई है।
तीन पीढ़ियां… एक संकल्प
इस भावुक यात्रा में कांवड़ अपने कंधों पर उठाए हुए हैं बहू पिंकी, कांवड़ में बैठी हैं उनकी बुजुर्ग सास ऊषा देवी, जबकि उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है छोटी पोती राधा।
हरिद्वार से हापुड़ तक का यह सफर सिर्फ दूरी तय करने का नहीं, बल्कि रिश्तों की मजबूती और भारतीय पारिवारिक संस्कारों को जीने का संदेश भी दे रहा है।
वृद्ध सास को कांवड़ में बैठाकर में बहू की पैदल यात्रा
हरिद्वार: कांवड़ यात्रा के दौरान रिश्तों और संस्कारों की अनोखी मिसाल देखने को मिली है जहां एक बहू ने वृद्ध सास को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से हापुड़ तक पैदल यात्रा शुरू की है, साथ ही इस यात्रा में पोती भी अपनी दादी की सेवा… pic.twitter.com/KybHfDQmsc
— News Leader (@NewsLeaderLive) July 18, 2026
सास की एक इच्छा बनी बहू का संकल्प
हापुड़ निवासी ऊषा देवी की लंबे समय से इच्छा थी कि वह हरिद्वार जाकर गंगा स्नान करें और कांवड़ यात्रा का हिस्सा बनें। लेकिन बढ़ती उम्र के कारण उनके लिए इतनी लंबी पैदल यात्रा करना संभव नहीं था।
परिवार में चार बेटे होने के बावजूद उनकी इस इच्छा को पूरा करने की जिम्मेदारी उनकी बहू पिंकी ने अपने ऊपर ली। वह सास को हरिद्वार लेकर पहुंचीं, हर की पैड़ी पर गंगा स्नान कराया और फिर उन्हें विशेष कांवड़ में बैठाकर पैदल यात्रा शुरू कर दी।
कंधों पर सिर्फ कांवड़ नहीं, सास का सम्मान भी
हरिद्वार से हापुड़ तक करीब 170 किलोमीटर का सफर आसान नहीं है। इसके बावजूद पिंकी बिना थके अपनी सास को कंधों पर बैठाकर आगे बढ़ रही हैं।
पिंकी का कहना है कि उनके लिए सास की सेवा कोई बोझ नहीं, बल्कि सौभाग्य है। उनका मानना है कि जिस तरह माता-पिता पूरी जिंदगी अपने बच्चों के लिए समर्पित रहते हैं, उसी तरह बुढ़ापे में उनकी सेवा करना हर परिवार का सबसे बड़ा धर्म है।
छोटी राधा ने भी जीता लोगों का दिल
इस यात्रा का एक और भावुक चेहरा है छोटी राधा। खेलने-कूदने की उम्र में वह अपनी दादी और मां के साथ पूरी श्रद्धा से यात्रा कर रही है।
रास्ते में वह कभी कांवड़ संभालने में मदद करती है, तो कभी दादी का हालचाल पूछती रहती है। श्रद्धालुओं का कहना है कि इतनी छोटी उम्र में सेवा और बड़ों के सम्मान के ऐसे संस्कार आज के समय में कम ही देखने को मिलते हैं।
जहां से गुजर रही कांवड़, वहीं रुक रहे लोग
हरिद्वार से हापुड़ तक की यात्रा के दौरान यह परिवार लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
जहां-जहां से यह कांवड़ गुजरती है, श्रद्धालु कुछ पल के लिए रुक जाते हैं। कोई बहू पिंकी का हौसला बढ़ाता है, कोई तस्वीरें खिंचवाता है, तो कई लोग भावुक होकर उन्हें ‘आधुनिक श्रवण कुमार’ कहकर सम्मान देते हैं।
सोशल मीडिया पर भी इस परिवार की तस्वीरें और वीडियो तेजी से साझा किए जा रहे हैं।
सिर्फ कांवड़ यात्रा नहीं, रिश्तों की मिसाल
यह यात्रा केवल हरिद्वार से हापुड़ तक की धार्मिक पदयात्रा नहीं है, बल्कि भारतीय परिवार व्यवस्था, संस्कार और सेवा भाव का जीवंत उदाहरण भी है।
आज के समय में जब अक्सर रिश्तों में दूरियां बढ़ने की बातें होती हैं, तब बहू पिंकी, सास ऊषा देवी और पोती राधा की यह यात्रा यह संदेश देती है कि परिवार की असली ताकत प्रेम, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी में छिपी होती है।
यही वजह है कि इस परिवार की कहानी हजारों श्रद्धालुओं और सोशल मीडिया पर लोगों के दिलों को छू रही है।